होली की छुटियां होने के 3-4 दिन पहले से ही आरती काम पर नहीं जा रही हैं। उन्हें बीते 4 दिनों से कमर में तेज़ दर्द, सर दर्द और बुखार की समस्या है। आरती भोपाल से 319 किमी दूर खरगोन की एक कॉटन जीनिंग मिल में काम करती हैं। उनका दिन सुबह 5 बजे शुरू होता है। दिन के पहले हिस्से में वो अपने परिवार के लिए खाना बनाती हैं। फिर सुबह 8 बजे पास स्थित जीनिंग मिल में काम करने चली जाती हैं। यहां वह कपास के रेशों के बीच रात के 8 बजे तक काम करती हैं।
दरअसल एक जीनिंग मिल में किसान से लिए गए कपास से कॉटन लिंट और कॉटन सीड को अलग किया जाता है। इस कॉटन लिंट को ड्रायर से गुज़ारने के बाद जीन स्टैंड या ट्रे में इकठ्ठा किया जाता है। इसे प्रेस करके गठान (cotton bale) बनाई जाती हैं।
आरती जीनिंग मिल के काम से लौट कर भी घर के कामों का दोहराव ही करती हैं। वह कहती हैं,
“फैक्ट्री (मिल) से आने के बाद इतना थक जाते हैं कि रोटी बनाने का भी मन नहीं होता। बीमार हो जाते हैं तब भी बनाते ही हैं रोटी, क्या करें खाना तो बनाना ही पड़ेगा।”
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आरती जीनिंग के काम के कारण होने वाली दिक्कतों के बारे में बताते हुए कहती हैं कि उन्हें अक्सर सर में तेज़ दर्द, बुखार, सांस लेने में तकलीफ और सीने में जकड़न सी महसूस होती है। यह बायसिनोसिस (Byssinosis) के लक्षण हैं।
आरती का अब तक का जीवन मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में गुज़रा है। यह क्षेत्र अपनी तेज़ गर्मी के साथ-साथ कपास के उत्पादन के लिए जाना जाता है। खरगोन की कपास मंडी में किसानों से खरीदा गया कपास यहां मौजूद जीनिंग फैक्ट्रियों में लाया जाता है। यहां कपास से बीज अलग करके रुई की गठान बनाई जाती है। इस दौरान आरती जैसे यहां काम करने वाले कई लोग एक ऐसी हवा में सांस ले रहे होते हैं जहां कपास के छोटे-छोटे रेशे मौजूद होते हैं। ये उनमें बायसिनोसिस की बीमारी पैदा करता है जिससे उनके फेफड़े की क्षमता घट जाती है।
क्या होती है बायसिनोसिस
बायसिनोसिस (Byssinosis) फेफड़े से संबंधित एक पेशागत बिमारी (occupational lung disease) है। यह ऐसे लोगों को होती है जो कपास से संबंधित किसी भी व्यवसाय से जुड़े होते हैं और कॉटन डस्ट (cotton dust) के लगातार संपर्क में आते हैं। इस कॉटन डस्ट में पौधों के बेहद महीन अवशेष, फाइबर, बैक्टीरिया, फंगी और कीटनाशक जैसे बेहद छोटे तत्व मौजूद होते हैं।
डॉ हर्ष महाजन बीते 10 सालों से खरगोन ज़िला अस्पताल में श्वास से संबंधित बीमारियों का इलाज कर रहे हैं। वह खरगोन जिला अस्पताल में जिला टीबी अधिकारी (DTO) के तौर पर भी काम कर रहे हैं। बायसिनोसिस के बारे में बताते हुए वह कहते हैं,
“कॉटन डस्ट के पार्टिकल हमारे फेफड़ों में एक फौरेन एलिमेंट (foreign element) की तरह जमा होते जाते हैं। हमारा शरीर इन्हें बाहर निकालने की कोशिश तो करता है मगर ये शरीर में घुल नहीं सकते इसलिए ये कॉटन डस्ट शरीर में जमा होते जाता है। इससे फेफड़े की ऑक्सीजन लेने की क्षमता कम हो जाती है।”
डॉ महाजन बताते हैं कि कॉटन जीनिंग मिल में काम करने वाले मज़दूरों में इस बिमारी का खतरा सबसे ज़्यादा होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह लगातार कॉटन डस्ट के बीच बिना किसी सुरक्षा के काम कर रहे होते हैं।
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आरती गणेश एग्रो प्रोडक्ट नाम की जिनिंग मिल में काम करती है। उसका आधा दिन इस मिल में कॉटन लिंट (cotton lint) को कॉटन सीड से अलग करने, झाड़ू लगाने, जीनिंग मिल के अंदर कॉटन के ट्रे बदलने में जाता है। इस मिल के चारो ओर कॉटन के रेशे दिखाई देते हैं। यह रेशे मिल की मशीनों के हर हिस्से के साथ ही खिड़कियों, ऊंचे तारों और यहां तक की पेड़ों में लिपटे हुए हैं।
डॉ महाजन के अनुसार यही रेशे जब आरती जैसी किसी कर्मचारी के फेफड़ों में सांस के ज़रिए इकठ्ठा होते जाएंगे तो एक समय के बाद उसका शरीर टाइप वन रेस्पेरिट्री फेलियर (type-1 respiratory failure) का शिकार हो जाता है। आसान भाषा में कहें तो कॉटन डस्ट (स्थानीय भाषा में क्षारी) में सांस लेते रहने से उनका फेफड़ा रक्त के साथ ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता खो देता है। इससे मरीज़ के ऑर्गन ठीक से काम नहीं कर पाते साथ ही उनमें हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।
दुनिया में बायसिनोसिस
दुनिया में इस बिमारी का इतिहास बहुत पुराना है। 1830 के दशक में डॉ जेम्स फिलिप्स ने इंग्लैंड की कॉटन मिल में काम करने वाले मज़दूरों में इसके लक्षण देखे थे। 1855 में एलिजाबेथ गास्केल अपने उपन्यास ‘नार्थ एंड साउथ’ में एक पात्र के ज़रिए इसके लक्षणों को बताती हैं।
उपन्यास में एक 19 साल की कर्मचारी बेस्सी हिग्गिंस (Bessy Higgins) की मौत इसी तरह की तकलीफ से होती है। हिग्गिंस कहती है, “जब वे कपास की कार्डिंग कर रहे होते हैं, तो उसमें से छोटे-छोटे टुकड़े उड़कर हवा में भर जाते हैं, जब तक कि यह महीन सफेद धूल जैसा न दिखने लगे। यह सफेद धूल फेफड़ों के चारों ओर घूमती है, और सीने को लगातार कसती जाती है।”
उपन्यास के इस वर्णन से गुज़रते हुए आरती ही याद आती हैं। वह बताती हैं कि वह केवल बारह साल की थीं तब से वह जीनिंग मिल में काम कर रही हैं।
सेंट्रल यूरोप की पलाकी विश्वविद्यालय ओलोमौक (Palacký University Olomouc) की मैरी नक्लाडालोवा (Marie Nakládalová) 2000 में लिखे अपने एक शोध पत्र में बताती हैं कि इंडोनेशिया में बाइसिनोसिस की व्यापकता दर लगभग 30%, सूडान में 37%, इथियोपिया में 40% और भारत में 50% तक देखी गई है।
भारत में बायसिनोसिस
भारतीय संसद की कार्यवाहियों में पहली बार इस बिमारी का ज़िक्र 12 दिसंबर 1974 में मिलता है। इस दौरान उत्तर प्रदेश के अमरोहा से सांसद इशाक संभाली ने पूछा था कि क्या टेक्सटाइल इंडस्ट्री में काम करने वाले 12% मज़दूर बायसिनोसिस से पीड़ित हैं? इस पर जवाब देते हुए तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार नियोजन मंत्री कर्ण सिंह ने बताया था कि इस बिमारी का अलग से कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है।
इस बहस के 50 साल बीत जाने के बाद भी अब तक केंद्र सरकार के पास इस बिमारी का अलग से कोई भी आंकड़ा मौजूद नहीं है। मगर 2000 से लेकर 31 अगस्त 2023 तक इस विषय पर भारत में 1100 से भी ज़्यादा अध्ययन हो चुके हैं। इन अध्ययनों के विश्लेषण पर आधारित एक लेख के अनुसार भारत के कपड़ा कारखानों में काम करने वाले लगभग 10 से 15 मिलियन लोग इस बिमारी से पीड़ित हैं।
मध्य प्रदेश में इसके कितने मरीज हैं इसको लेकर भी पर्याप्त आंकड़ें उपलब्ध नहीं है। मगर खरगोन से लगभग 136 किमी दूर बुरहानपुर के मोमिनपुरा में ‘होम बेस्ड’ पावरलूम में काम करने वाले 290 कर्मचारियों पर हुए अध्ययन में 98% कर्मचारी बायसिनोसिस से पीड़ित पाए गए थे।
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डॉ महाजन कहते हैं कि उनके पास बहुत कम लोग ही बायसिनोसिस का इलाज करवाने आते हैं। वह कहते हैं कि इसके पीछे का एक कारण इस बिमारी को लेकर जागरूकता की कमी है। वह कहते हैं कि चूंकि यह बिमारी फेफेड़े को सीधे प्रभावित करती है इसलिए इनमें टीबी की बिमारी भी आम होती है। ऐसे में आम तौर पर इनके इलाज के रूप में टीबी का इलाज ही किया जाता है। कई बार ये भी होता है कि इसके मरीज को टीबी की दवाई दो से तीन बार खिलाई जा चुकी होती है। इससे उनमें यह बिमारी ठीक तो नहीं होती बल्कि मरीज़ में फोटोसेंसिटिविटी बढ़ जाती और उसका लीवर भी क्षतिग्रस्त हो सकता है।
मगर एक आम इंसान को यह कैसे पता चलेगा कि वह इस बिमारी से पीड़ित है? इसका जवाब देते हुए डॉ महाजन कहते हैं,
“किसी भी मरीज के ब्रोंकोस्कोपी (bronchoscopy) टेस्ट से उनमें बायसिनोसिस का पता लगाया जा सकता है।”
डॉ महाजन ने बताया कि खरगोन के जिला अस्ताल में जब कोई मरीज आसानी से डायग्नोस नहीं होता है तो वह ब्रोंकोस्कोपी के ज़रिए ही बिमारी का पता लगाते हैं। मगर इस बिमारी का समय रहते पता लगाना ज़रूरी है। देर होने पर यह कितनी खतरनाक हो सकती है इसका अंदाज़ा डॉ महाजन के पहले बायसिनोसिस केस से लगाया जा सकता है।
डॉ महाजन 2019 के आस-पास आए एक मरीज़ का ज़िक्र करते हुए बताते हैं,
“वह मरीज जब हमारे पास आया तब तक उसका टाइप 1 रेस्पेरिट्री फेलियर और हार्ट फेलियर हो चुका था। उसकी दशा ऐसी थी कि हम कुछ भी नहीं कर सकते थे। ऐसे में हमने उसको होम ऑक्सीनेशन (home oxygenation) की सलाह दी थी।”
इस बिमारी में देरी का मतलब है मौत के और करीब जाते जाना। डॉ महाजन बताते हैं कि इस बिमारी का कोई इलाज नहीं है ऐसे में पीड़ित को पूरी तरह ठीक तो नहीं किया जा सकता बस कॉटन डस्ट वाले वातावरण से दूर कर उसका जीवन थोड़ा बढ़ाया ही जा सकता है।
कितना आसान है इस बिमारी से बचना?
मगर आरती के लिए ये दूरी बनाए रख पाना बेहद मुश्किल है। आरती खरगोन के कुंदनपुरा इलाके में रहती हैं। उनके पास मकान के नाम पर एक पंक्ति में बने हुए क्वाटर्स का एक हिस्सा है। यह एक छोटा सा कमरा है जिनमें टिन शेड की छत डली हुई है। यह मकान उन्हें जीन मालिकों द्वारा ही दिए गए हैं। अगर आरती कभी बिमार होने की वजह से एक हफ्ते तक काम पर नहीं जाएंगी तो उसका आशियाना भी खतरे में पड़ जाता है। वह बताती हैं,
“अगर कभी एक हफ्ते काम पर नहीं जाओ तो मालिक लोग बोलने लगते हैं कि मकान में रह रही है और काम पर नहीं आती। वो लोग ऐसे में हमें मकान खाली करने की धमकी देने लगते हैं।”
ऐसे में वो खुद को बायसिनोसिस से कैसे बचाती हैं?
आरती पूरा दिन मुंह में कपड़ा बांध कर काम करती हैं। गर्मी के दौरान ऐसा करना कठिन होता जाता है मगर मुंह से कपड़ा हटाने का मतलब है बीमार होना।
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आरती की ही तरह रानू भी 12 घंटे जीनिंग मिल में काम करती हैं। इसके लिए उनको 250 रूपए प्रति दिन मज़दूरी मिलती है। सुबह 8 बजे से जीनिंग मिल में काम करने वाली रानू अगर शाम को 6 बजे छुट्टी लेना चाहे तो उसे दिन के 200 रूपए ही मिलेंगे।
बढ़ती गर्मी के बीच रानू केवल आधे से एक घंटे ही मुंह में कपड़ा बांधे रख पाती हैं। घुटन होने पर उन्हें इस अंतराल में बाहर निकलना पड़ता है।
“जब मालिक नहीं रहता तो बाहर आ जाते हैं और कपड़ा खोल लेते हैं।”
क्षारी में सांस लेने से क्या होता है? इसका जवाब देते हुए रानू कहती हैं कि अगर वो कपडा नहीं बांधें तो उनको सर्दी-ज़ुखाम और बुखार होने लगता है। ऐसे में भी उनको ‘दवाई लेकर काम करना पड़ता है’।
डॉ महाजन बताते हैं कि इस रोग से बचाव में कपड़ा बांधना बहुत कारगर नहीं होता क्योंकि इसमें गैप रह जाते हैं जिससे कॉटन डस्ट अंदर जा सकती है। वह कहते हैं कि इससे बचने के लिए मास्क पहनना ही सबसे कारगर है। मगर जीनिंग मिल के कई कर्मचारी हमसे कहते हैं कि उन्हें यह मास्क भी नहीं दिए जाते।
इस पर व्यापारियों का पक्ष रखते हुए फेडरेशन ऑफ़ एमपी चेम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के प्रदेश उपाध्यक्ष कैलाश अग्रवाल कहते हैं,
“यहां का व्यापारी चाहता है कि वह अपने वर्कर्स को यह सारी सुविधाएं दे। मगर सरकार द्वारा ब्याज और टैक्स ज़्यादा होने के चलते उसकी लागत बढ़ जाती है जिसके कारण वो इस पर ध्यान नहीं दे पाता।”
मगर आरती हों या रानू या फिर इनकी तरह जीनिंग मिल में काम करने वाले और कर्मचारी (labour), सभी को बायसिनोसिस होने का खतरा बना रहता है। इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले ज़्यादातर मज़दूर आदिवासी और भूमिहीन हैं। आरती जैसे कुछ मज़दूर ऐसे भी हैं जिनके परिवार के पास बहुत थोड़ी सी ही ज़मीन है ऐसे में जीवन चलाने के लिए जीनिंग मिल की क्षारी के बीच काम करना उनकी मजबूरी है। ऐसे में उनको बायसिनोसिस से बचाने के लिए मास्क जैसी सुविधाएं देना तो ज़रूरी है ही साथ ही यह और भी ज़रूरी है कि उनका समय-समय पर मेडिकल चेकअप होता रहे। इसके लिए बिमारी के प्रति जागरूक होना भी बेहद ज़रूरी है।
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