
Mayawati political strategy
Mayawati political strategy
Mayawati political strategy: उत्तर प्रदेश की राजनीति में काफी लंबे वक़्त से हाशिए पर जा चुकी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने बड़ा और महत्वपूर्ण संगठनात्मक बदलाव किया है। पार्टी सुप्रीमो मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को मुख्य राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर बनाकर न सिर्र्फ उन्हें नंबर दो की पोजिशन दिया है, बल्कि साल 2027 के विधानसभा चुनावों को मद्देनज़र सियासी समीकरण को सतर्कता से साधने का भी प्रयास किया है। इसके साथ ही उन्होंने विश्वनाथ पाल पर विश्वास जताते हुए उन्हें लगातार दूसरी बार उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष बनाया है।
इन बदलावों के माध्यम से मायावती ने यह स्पष्ट रूप से सन्देश देने का प्रयास किया है कि बसपा अब अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए आक्रामक रणनीति अपनाएगी। अब सवाल ये खड़ा होता है कि क्या आकाश आनंद वाकई बसपा को फिर से राजनीतिक अस्तित्व में वापस ला पाएंगे और समाजवादी पार्टी (सपा) जैसी बड़ी विपक्षी ताकत को चुनौती दे सकेंगे?
बसपा की गिरती सियासी जमीन
सबसे पहले बात करते हैं बसपा के संस्थापक कांशीराम की… जिन्होंने दलित समाज में राजनीतिक चेतना जगाकर भारतीय राजनीति की तस्वीर बदल दी थी। उसके बाद मायावती इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए 4 बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन देखा जाए तो पिछले डेढ़ दशक में बसपा का ग्राफ लगातार नीचे गिरता रहा है।
समझने के लिए इन बिंदुओं पर एक नज़र डाले…
– साल 2012 के विधानसभा चुनावों में बसपा सत्ता से बाहर हो गयी थी।
– साल 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी तकरीबन सिमट गई।
– साल 2022 विधानसभा चुनावों में बसपा को सिर्फ एक विधायक पर संतोष करना पड़ा।
– आज 2025 में बसपा के पास लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है।
यानी मायावती जिस राजनीतिक ताकत से कभी पूरे उत्तर भारत में राज़ किया करती थीं, अब वही पार्टी अस्तित्व के संकट से बुरी तरह मार खा रही है।
अब… आकाश आनंद की एंट्री और बढ़ता कद
मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को अब मुख्य राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर का पदभार सौंप दिया है जिससे ये साफ कर दिया है कि बसपा में अब उनका सियासी कद किसी भी अन्य नेता से ऊपर होगा, क्योंकि :
1. मायावती के बाद यह सबसे बड़ा पद होता है।
2. आकाश अब सभी राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय और सेक्टर कोऑर्डिनेटरों के कार्य की समीक्षा करेंगे।
3. टिकट वितरण, चुनावी प्रचार और संगठनात्मक गतिविधियों में सिधीतौर सी हस्तक्षेप कर सकेंगे।
यानी मायावती ने अब आकाश को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने की दिशा में पहला बड़ा कदम बढ़ा दिया है।
रामजी गौतम के पर कतर दिए गए
हालांकि इस अदला-बदली में सबसे बड़ी चोट रामजी गौतम को आयी है। पहले उनके पास देश के आधे से अधिक राज्यों की जिम्मेदारी थी, लेकिन अब उन्हें केवल 4 राज्यों – दिल्ली, मध्य प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ तक ही सीमित कर दिया गया है। बता दे, यह मायावती की साफतौर से रणनीति को दर्शाता है कि अब पार्टी में केंद्र बिंदु आकाश आनंद होंगे और बाकी नेता उनके निरिक्षण में काम करेंगे।
विश्वनाथ पाल पर विश्वास
मायावती ने एक और बड़ा संदेश देते हुए विश्वनाथ पाल को लगातार दूसरी बार उत्तर प्रदेश का प्रदेश अध्यक्ष चुना है। यह पहली बार है जब बसपा सुप्रीमो ने किसी को लगातार दो कार्यकाल के लिए प्रदेश अध्यक्ष पद पर बरकरार रखा है। विश्वनाथ पाल OBC समाज, विशेषकर पाल-गड़रिया समुदाय से संबंध रखते हैं, जो कभी बसपा का महत्वपूर्ण वोटबैंक हुआ करता था। मायावती का यह दांव साल 2027 के चुनाव से पहले OBC समीकरण को साधने की दिशा में सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है।
सपा बनाम बसपा: कौन टिकेगा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति लंबे समय से भाजपा और सपा के इर्द-गिर्द घूम रही है। आज देखा जाए तो बसपा का वोटबैंक पूरी तरह से बिखर चुका है। दलित मतदाता बड़ी संख्या में भाजपा और सपा दोनों खेमों में बंट चुके हैं। इसी कड़ी में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आकाश आनंद क्या सपा को चुनौती देकर बसपा को फिर से अस्तित्व में कैसे ला पायेंगे….? समझने के लिए इन बिंदुओं पर एक नज़र डालें…
– सपा की मजबूत पकड़ यादव और मुस्लिम वोटबैंक पर है।
– बसपा को दलित और गैर-यादव OBC वोट वापस खींचने होंगे।
– यदि आकाश आनंद युवाओं और नए मतदाताओं को जोड़ने में सफल हुए तो बसपा का परफॉर्मेंस सुधर सकता है।
अब आकाश आनंद को कौन से राजनीतिक खेल खेलने होंगे?
बसपा को दोबारा अस्तित्व में लाने के लिए आकाश आनंद को कई सियासी दांव आजमाने होंगे, जैसे कि:
1. दलित वोटबैंक की घर वापसी: दलित समाज का बड़ा हिस्सा भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की और जा चुका है। आकाश को इन समुदायों को फिर से जोड़ने के लिए आक्रामक कैंपेन और जमीनी जुड़ाव मजबूत करना होगा।
2. युवा और सोशल मीडिया रणनीति: उत्तर प्रदेश की राजनीति में सोशल मीडिया ने मजबूती से पैर जमा लिए हैं। आकाश को युवाओं के बीच अपनी छवि मजबूत करनी होगी और डिजिटल माध्यमों से पार्टी का प्रचार ज़ोरों-शोरों से करना होगा।
3. गठबंधन की राजनीति: अकेले दम पर बसपा के लिए सत्ता तक पहुंचने में काफी मुश्किल हो सकती है। आकाश को क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों के साथ तालमेल बिठाना होगा।
4. गैर-यादव OBC और मुस्लिम वोट: सपा जहां यादव-मुस्लिम समीकरण पर टिकी है, वहीं बसपा को गैर-यादव OBC और दलित-मुस्लिम एकता के माध्यम से नए समीकरण बनाने होंगे।
5. जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता: पिछले कई चुनावों में बसपा की बड़ी कमजोरी रही कि कार्यकर्ता निष्क्रिय हो गए थे। आकाश को संगठन को नए जोश से भरना होगा।
बता दे, मायावती का यह कदम स्पष्ट रूप से संकेत दे रहा है कि बसपा अब पूरी तरह से आकाश आनंद के चेहरे पर दांव लगाने जा रही है। हालांकि पिछले कई सालों से बसपा के हालातों को देखते हुए यह आसान सफर नहीं होगा लेकिन सपा की जमीनी पकड़, बीजेपी की सत्ता और कांग्रेस की कोशिशें – इन सबके बीच आकाश को अपने लिए जगह बनानी होगी। यदि आकाश आनंद सही रणनीति और सियासी दांव खेलते हैं, तो बसपा एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति में चर्चा का केंद्र बन सकती है।
अब आपके हिसाब से क्या आकाश आनंद, मायावती की छत्रछाया में बसपा को सपा जैसी बड़ी ताकत के बराबर खड़ा कर पाएंगे? इसपर आपकी क्या राय है…