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    Home » कूटनीति में मिठास घोलते आम-नेहरू से मोदी तक कैसे चली आ रही है ‘मैंगो डिप्लोमेसी’ की परंपरा
    राजनीति

    कूटनीति में मिठास घोलते आम-नेहरू से मोदी तक कैसे चली आ रही है ‘मैंगो डिप्लोमेसी’ की परंपरा

    Janta YojanaBy Janta YojanaJuly 20, 2025No Comments10 Mins Read
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    Mangoes Add Sweetness to Diplomacy (Image Credit-Social Media)

    Mangoes Add Sweetness to Diplomacy (Image Credit-Social Media)

    Mangoes Add Sweetness to Diplomacy : दुनिया में शायद ही कोई और फल होगा जिसने दक्षिण एशिया की कूटनीति में इतनी अहम भूमिका निभाई हो जितनी आम ने निभाई है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और यहां तक कि चीन व अमेरिका के साथ भी आम के डिब्बे रिश्तों की गर्मजोशी के प्रतीक बने हैं। हाल ही में बांग्लादेश के अंतरिम सरकार प्रमुख मोहम्मद यूनुस की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे गए 1,000 किलो आमों ने एक बार फिर ‘मैंगो डिप्लोमेसी’ को सुर्खियों में ला दिया है। हालांकि बांग्लादेश के इस ताजा कदम से यह सवाल भी उठता है कि क्या वाकई यह ‘मैंगो डिप्लोमेसी’ फिर से भारत-बांग्लादेश संबंधों में गर्मजोशी ला सकेगी? या यह भी पूर्व की तरह सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार बनकर रह जाएगी?आइए इस विषय पर जानते हैं विस्तार से –

     बांग्लादेश के बदले सुर और आम कूटनीति के पीछे क्या है संदेश

    बांग्लादेश की अंतरिम सरकार प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने जब इस हफ्ते दिल्ली स्थित पीएम मोदी के आवास पर आमों का तोहफ़ा भिजवाया तो संदेश साफ था कि दिल्ली और ढाका के रिश्तों में कड़वाहट कम करने की पहल। हालांकि इससे पहले भी पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना हर साल गर्मियों में पीएम मोदी को आम भेजती रही हैं। शेख हसीना के भेजे गए रंगपुर के हरिभंगा और राजशाही के आम्रपाली आम न सिर्फ प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति तक पहुंचे, बल्कि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे सीमावर्ती राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक भी पहुंचे।बांग्लादेश के राजनयिक खुद मानते रहे हैं कि आम ऐसा फल है, जिसे पूरे उपमहाद्वीप में पसंद किया जाता है और यह रिश्तों में मिठास घोलने का काम करता है।

    भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि, बांग्लादेश इस समय अमेरिका से व्यापारिक दबाव, म्यांमार संकट और मध्य-पूर्व के हालातों के कारण दबाव में है। इसलिए वह भारत के साथ फिर से रिश्तों को पटरी पर लाने के प्रयास कर रहा है। यूनुस का ‘आम उपहार’ इसी प्रयास का हिस्सा माना जा रहा है।

     भारत की पुरानी परंपरा- नेहरू युग से शुरू हुआ आमों का कूटनीतिक सफर

    आज भी ‘मैंगो डिप्लोमेसी’ के किस्से दुनिया में चर्चा में हैं, लेकिन इसकी जड़ें भारत में नेहरू युग से जुड़ी हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत ने कूटनीतिक संबंधों को मधुर बनाने के लिए सांस्कृतिक संदेशवाहक के तौर पर आम का इस्तेमाल करना शुरू किया।

    1950 के दशक में नेहरू ने दुनिया के कई राष्ट्राध्यक्षों और नेताओं को उपहार में आम भेजे। इससे संदेश साफ था कि भारत न सिर्फ राजनीतिक रिश्ते चाहता है, बल्कि सांस्कृतिक और मानवीय संबंधों को भी महत्व देता है।

    1950 के दशक में पंडित जवाहरलाल नेहरू जब भी विदेश यात्रा पर जाते, तो साथ में आमों की टोकरी ले जाते थे। 1955 में चीन यात्रा के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री चाऊ एनलाई को दशहरी और लंगड़ा आम के पौधे उपहार में दिए। जिन्हें ग्वांगझोउ के पीपुल्स पार्क में लगाया गया। यही नहीं, सोवियत नेता ख्रुश्चेव जब भारत आए तो उन्हें भी उत्तर प्रदेश के मलीहाबादी दशहरी आमों की टोकरियां भेंट की गईं। इसके बाद यह परंपरा पाकिस्तान, बांग्लादेश और दक्षिण एशिया के देशों के साथ रिश्तों में भी दिखने लगी। पाकिस्तान के हुक्मरानों की ओर से भारत के प्रधानमंत्रियों को ‘तोहफ़े के तौर पर आम भेजने’ की शुरुआत भी इसी दौर में मानी जाती है।

    राजीव गांधी और अमेरिकी राष्ट्रपति बुश की आमों से जुड़ी कहानियां

    1986 में राजीव गांधी ने फिलीपींस यात्रा के दौरान वहां के राष्ट्रपति को भारतीय आमों का डिब्बा भेंट किया था, जबकि 2006 में जॉर्ज डब्ल्यू बुश के भारत दौरे में ‘मैंगो इनिशिएटिव’ के तहत अमेरिका ने भारतीय आमों पर लगे प्रतिबंध को हटाया। कहा जाता है कि राष्ट्रपति बुश खुद भारतीय आमों के स्वाद के दीवाने थे।

     पाकिस्तान और चीन के रिश्तों में भी ‘मैंगो कूटनीति’ का असर

    1968 में पाकिस्तान के विदेश मंत्री मियां अरशद हुसैन बीजिंग पहुंचे और उन्होंने चीन के नेता माओत्से तुंग को आम भेंट किए। उस समय चीन में आम एक दुर्लभ और लगभग अनदेखा फल था। माओ ने इन आमों को अपने पास रखने के बजाय सांकेतिक रूप से श्रमिकों और क्रांतिकारी छात्रों को उपहार में दे दिया।

    चीन में सांस्कृतिक क्रांति चल रही थी और माओ के हर कार्य को ‘क्रांतिकारी संदेश’ माना जाता था। आमों को फॉर्मेल्डिहाइड में संरक्षित कर फैक्ट्रियों, खेतों और मजदूर संगठनों में प्रदर्शित किया गया, ताकि लोग इसे ‘माओ का आशीर्वाद’ मानकर पूजें।

    धीरे-धीरे आम ‘माओ की क्रांति के प्रतीक’ बन गए। यहां तक कि चीनी समाज में आम की पूजा, उसकी मूर्तियां और उससे जुड़े गीत भी प्रचलन में आए। इसे इतिहास में Mango Cult यानी ‘आम पूजा आंदोलन’ के रूप में भी जाना जाता है, जो सांस्कृतिक क्रांति की विचित्र घटनाओं में से एक माना जाता है।

     भारत-पाकिस्तान के बीच भी आम बना कूटनीतिक दूत

    रिश्तों में कड़वाहट को कम करने के लिए भारत-पाकिस्तान के बीच कई बार आम एक कूटनीतिक दूत के तौर पर भी इस्तेमाल में लाए गए हैं।1981 में पाकिस्तानी राष्ट्रपति जिया-उल-हक और इंदिरा गांधी के बीच आमों किस अदान प्रदान हुआ। तब पाकिस्तान ने ‘अनवर रटौल’ किस्म का आम भेजा था, जिस पर यह बहस छिड़ गई थी कि इसका मूल भारत के यूपी से जुड़ा है न कि पाकिस्तान से।

    2001 में मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान में SAARC सम्मेलन में भाग लेने के बाद अपने पाकिस्तानी समकक्ष यूसुफ़ रज़ा गिलानी को अल्फांसो आम भेंट किए, हालांकि तत्काल उनका उत्तर नहीं मिला।

    अगस्त 2003 में परवेज़ मुशर्रफ़ (राष्ट्रपति) और प्रधानमंत्री मीर ज़फ़रुल्लाह खान जैमाली ने भारतीय राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को आम तौहफे में भेजे।

    2008 में आसिफ अली जरदारी ने मनमोहन सिंह को आमों का तोहफ़ा भेजा, लेकिन उसी साल मुंबई हमलों ने इस तोहफे की गर्मजोशी को ठंडा कर दिया।

    2010 में पाक के गृह मंत्री रहमान मलिक ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल और मीडिया को मीठे आम के पैकेट उपहार में दिए, जिन्हें सीमा पार भेजा गया।

    सितंबर 2014 को नवाज़ शरीफ़ ने एक बॉक्स चौंसा और सिन्धरी आम पीएम नरेन्द्र मोदी को भेजे, जिसके पीछे तनाव कम करने और UNGA न्यू यॉर्क संवाद की संभावनाएं बनी रहें जैसी वजहें थीं।

    2015 में नवाज़ शरीफ़ ने नरेंद्र मोदी, प्रणब मुखर्जी और सोनिया गांधी को आम भेजे, लेकिन द्विपक्षीय संबंधों पर खास असर नहीं पड़ा। सिद्धांत रूप में, पाकिस्तान हर साल अपनी सर्वोत्तम आम की किस्मों – सिन्धरी, चौंसा, अनवर रतौल आदि का राजनयिक उपहार के रूप में आदान-प्रदान जारी रखता है। यह डिप्लोमैटिक आदत रूप में माना जाता है।

    भारतीय आम और निर्यात की चुनौतियां

    भारतीय आम जितने ज्यादा स्वादिष्ट हैं उतनी ही अधिक चुनौतियां इन्हें संरक्षित रखने में आड़े आती हैं। भारत में करीब 1,200 किस्म के आम उगते हैं जबकि पाकिस्तान में 400 किस्में। मगर निर्यात के मामले में भारत को कई बार चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। आम विशेषज्ञों के अनुसार भारत के ज्यादातर आमों में फाइबर की मात्रा अधिक होने और जल्दी खराब होने के कारण उनकी शेल्फ़ लाइफ कम होती है। यही कारण है कि अल्फांसो को छोड़कर अन्य किस्मों का निर्यात बेहद सीमित है। वहीं, पाकिस्तान के सिंदूरी, चौसा और अनवर रटौल किस्में लंबी शेल्फ़ लाइफ के चलते पश्चिमी बाजार में ज्यादा लोकप्रिय हैं और अपने देश को आर्थिक रूप से मदद प्रदान करने में सफल रहीं हैं।

    पाकिस्तानी दूतावास भी अमेरिका में ‘मैंगो पार्टीज़’ आयोजित करता रहा है और वहां के सीनेटरों और नेताओं को तोहफे में आम भेजने की परंपरा निभाता आ रहा है।

    चीन और अमेरिका में भारतीय आमों की पकड़ बनाने की जद्दोजहद

    2004 में चीन ने भारतीय आमों के लिए अपने बाजार खोले लेकिन वहां भारतीय आम ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो सके। अमेरिका ने करीब दो दशक तक भारतीय आमों पर प्रतिबंध लगाए रखा, जिसे तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश द्वारा 2006 में हटाया गया। इसके बाद 2007 में जब भारतीय आम अमेरिका में पहुंचे तो न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि’इतिहास की सबसे बहुप्रतीक्षित फल डिलीवरी’।

    भारतीय आम दुनियाभर में अपने स्वाद और सुगंध के लिए मशहूर हैं, लेकिन चीन और अमेरिका जैसे बड़े बाजारों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराना भारत के लिए आसान नहीं रहा। इसके पीछे कारोबारी प्रतिस्पर्धा, सख्त आयात मानक और राजनीतिक समीकरण बड़ी वजह रहे हैं।

    अमेरिका में मंजूरी की लंबी प्रक्रिया

    अमेरिका में भारतीय आम, खासकर ‘अल्फांसो’ और ‘केसर’ की मांग काफी है। लेकिन वहां प्रवेश के लिए अमेरिका की यूएसडीए (US Department of Agriculture) की कठोर क्वारंटीन और फाइटोसैनिटरी शर्तें पार करना जरूरी होता है।

    2007 में जब पहली बार अमेरिका ने भारतीय आमों के आयात की मंजूरी दी, तब शर्त रखी गई थी कि आमों का रेडिएशन ट्रीटमेंट भारत में ही होना चाहिए। इसके लिए भारत में खास केंद्र बनाए गए, लेकिन उत्पादन और निर्यात पर इसकी लागत भारी पड़ी।

    हालांकि, भारतीय राजनयिक प्रयासों के बाद अमेरिका ने धीरे-धीरे कुछ छूट दी है, लेकिन वहां मेक्सिको और लैटिन अमेरिकी देशों से मुकाबला करना अब भी बड़ी चुनौती है, क्योंकि उनके आम वहां सस्ते और ज्यादा मात्रा में पहुंचते हैं।

     चीन में स्वाद से ज्यादा राजनीति

    चीन के बाजार में एक बार फिर भारतीय आमों की एंट्री 2017 में हुई, जब प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा के दौरान यह पहल हुई थी। चीन ने तब भारतीय आमों को ट्रायल के तौर पर आयात करने की सहमति दी थी। लेकिन उसके बाद से व्यापार में खास बढ़ोतरी नहीं हुई। इसकी दो वजहें रहीं—

    1. चीनी बाजार की अलग स्वाद प्राथमिकता, जहां उन्हें मीठे के बजाय हल्का खट्टा स्वाद पसंद है।

    2. भारत-चीन सीमा तनाव, जिसने व्यापारिक रिश्तों पर असर डाला।

     लगातार बढ़ रहे प्रयास

    भारत ने मॉस्को, टोक्यो और दुबई जैसे बाजारों में सफलता के बाद अब अमेरिका और चीन में भी फ्रूट फेस्टिवल्स, टेस्टिंग इवेंट्स और बिजनेस समिट्स के जरिए आमों को प्रमोट करना शुरू किया है।

    2024 में, भारत ने अमेरिकी कंपनियों के साथ रेडिएशन शुल्क कम करने और फाइटोसैनिटरी शर्तों में नरमी के लिए बातचीत तेज कर दी है। चीन में भी भारत ने ऑनलाइन मार्केटिंग और B2B ट्रेड प्लेटफॉर्म्स के जरिए उपस्थिति मजबूत करने का प्रयास किया है।

    भले ही भारत को अमेरिका और चीन में अब भी पूरी तरह से वांछित सफलता नहीं मिली हो, लेकिन कूटनीतिक प्रयास और स्वाद की पहचान के बूते भारत का आम धीरे-धीरे इन बाजारों में पैर जमा रहा है। अमेरिका में प्रवासी भारतीय समुदाय इसकी मांग को बनाए हुए है, जबकि चीन में भारत को अपने आमों का स्वाद चीनियों के टेस्ट के मुताबिक पेश करने की चुनौती स्वीकार करनी होगी।

    मैंगो डिप्लोमेसी एक सियासत, रिश्ते और बाजार का संगम

    सिर्फ रिश्तों में मिठास घोलने ही नहीं, दक्षिण एशियाई देशों के लिए आम बड़ा आर्थिक संसाधन भी है। भारत, पाकिस्तान और मैक्सिको दुनिया में सबसे ज्यादा आम निर्यात करने वाले देश हैं। वहीं, बांग्लादेश भी शीर्ष दस में शामिल है। इनके बीच वैश्विक बाजार में भी कड़ी प्रतिस्पर्धा रहती है।

    दक्षिण एशिया में आम सिर्फ स्वाद का विषय नहीं, बल्कि राजनीति, कूटनीति और बाज़ार का अहम हिस्सा है। चाहे वह पंडित नेहरू के दौर में चीन और सोवियत संघ के साथ संबंध हों या फिर मोदी युग में बांग्लादेश और अमेरिका के साथ व्यापारिक समीकरण ‘आम’ हर दौर में मिठास भरे संदेश का पर्याय बना है। समय बदला, सरकारें बदलीं, लेकिन ‘आम’ से रिश्तों में मिठास घोलने की यह भारतीय परंपरा आज भी जारी है।

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