
Jyotirlinga’s Darshan in Sawan (Image Credit-Social Media)
Jyotirlinga’s Darshan in Sawan (Image Credit-Social Media)
Jyotirlinga’s Darshan in Sawan: श्रावण मास यानी सावन का महीना, भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इस महीने में भक्तों का उत्साह और श्रद्धा अपने चरम पर होती है। चारों ओर हरियाली, जलधारा की कल-कल और शिव नाम की गूंज मन को अध्यात्म से भर देती है। सावन में सोमवार व्रत, शिवलिंग पर जलाभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना करने से जीवन में सुख, शांति और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है। विशेष रूप से देशभर के 12 ज्योतिर्लिंगों में से कुछ ऐसे हैं जिनके दर्शन सावन के दौरान करने से व्यक्ति को अद्भुत मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है। अगर आप भी 2025 के सावन में किसी दिव्य यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो इन छह प्रमुख ज्योतिर्लिंगों के दर्शन अवश्य करें, जहां शिव का तेज और भक्तों की आस्था एकाकार हो जाती है।
श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

सावन में बाबा विश्वनाथ का काशी में जलाभिषेक करना मानो आत्मा को साक्षात मोक्ष के द्वार पर ले आता है। गंगा किनारे बसी यह नगरी स्वयं शिव की प्रिय भूमि मानी जाती है। कहा जाता है कि यहां मृत्यु भी मोक्ष का कारण बनती है। सावन भर यहां गंगाजल लाने वाले कांवड़ियों की भीड़ लगी रहती है और मंदिर में हर दिन लाखों भक्त बाबा का जलाभिषेक करते हैं। सावन के हर सोमवार को विशेष श्रृंगार, रुद्राभिषेक और रात्रि में झांकी निकलती है।
मान्यता है कि स्वयं भगवान शिव ने वाराणसी को अपने त्रिशूल पर बसाया है। यहां अंतिम समय में प्राण त्यागने वाले को शिवजी ‘तारक मंत्र’ प्रदान करते हैं, जिससे वह मोक्ष प्राप्त करता है।
विशेष मान्यता के अनुसार कहते हैं, जब पृथ्वी पर प्रलय होगा तब भी वाराणसी और यह मंदिर नष्ट नहीं होगा। यह शिव के स्थायी निवास की पहचान है।
श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, उज्जैन (मध्य प्रदेश)
शिव के तीन रूपों में से एक रूद्र रूप का साक्षात्कार महाकालेश्वर में होता है। यह एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है, जिसकी भस्म आरती विश्वविख्यात है। सावन में भस्म आरती के लिए दर्शन की विशेष व्यवस्था होती है। मंदिर में तड़के 4 बजे से ही रुद्राभिषेक प्रारंभ हो जाता है और दिनभर श्रद्धालु अपनी अर्पण भावना के साथ दर्शन हेतु पहुंचते हैं।

इस स्थान को लेकर चर्चित कहानी के अनुसार उज्जैन के राजा चंद्रसेन शिव भक्त थे। एक बार चांडालों ने नगर पर आक्रमण कर दिया। तब एक बालक शिव भक्त ‘श्रीकर’ और उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने महाकाल के रूप में प्रकट होकर नगर की रक्षा की।
विशेष मान्यता के अनुसार महाकाल एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिणमुखी है, यानी उसका मुख दक्षिण दिशा में है। इसे मृत्यु के देवता यमराज को नियंत्रित करने वाला भी माना जाता है।
श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग, नासिक (महाराष्ट्र)

यह ज्योतिर्लिंग ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों के प्रतीक रूप में पूजित है। गोदावरी नदी के उद्गम स्थल पर स्थित यह मंदिर पवित्रता का प्रतीक है। सावन में यहां रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जाप और जलाभिषेक का विशेष महत्व होता है। त्र्यंबकेश्वर में शिव के साथ पार्वती माता की भी पूजा की जाती है, जिससे दांपत्य जीवन में सुख-शांति की कामना पूरी होती है।
इस स्थल को लेकर चर्चित कहानी के अनुसार, गौतम ऋषि ने एक बार अनजाने में एक गाय की हत्या कर दी और पाप से मुक्ति पाने के लिए गंगा को धरती पर लाने की कामना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गंगा को प्रकट किया, जो गोदावरी नदी के रूप में मानी जाती है। विशेष मान्यता है कि यहां शिवजी तीन मुखों (त्र्यंबक) ब्रह्मा, विष्णु और महेश में पूजे जाते हैं । इसके अलावा यहीं पर हर 12 वर्षों में कुंभ मेला भी होता है।
श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग, वेरावल (गुजरात)

अरब सागर के तट पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग भारत का सबसे प्राचीन माना जाता है। सावन में यहां भक्त सागर के जल से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और भव्य दीपमालिका सजाई जाती है। मंदिर से सूर्यास्त का दृश्य अद्भुत लगता है और भक्ति के रंग में रंग जाता है मन।
इस स्थल को लेकर लोकप्रिय कहानी
चंद्रदेव (चंद्रमा) ने दक्ष प्रजापति की 27 बेटियों में से केवल रोहिणी को अधिक स्नेह दिया। इस पर दक्ष ने उन्हें शाप दे दिया कि वे क्षय (कमजोर) होते जाएंगे। चंद्रदेव ने भगवान शिव की आराधना की और सोमनाथ में शिवजी ने उन्हें पुनः तेजस्वी होने का वरदान दिया।
विशेष मान्यता है कि यह शिव मंदिर 12 बार मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा तोड़ा गया, परंतु हर बार इसका पुनर्निर्माण हुआ। यह अडिग श्रद्धा और आस्था का प्रतीक है।
श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग, देवघर (झारखंड)

देवों के वैद्य यानी वैद्यनाथ का यह रूप भक्तों के समस्त रोगों का नाश करता है। सावन में यहां का शिवभक्तों का मेला विशेष प्रसिद्ध है, जिसमें दूर-दूर से कांवड़ लेकर जलाभिषेक करने श्रद्धालु आते हैं। यहां यह मान्यता है कि रावण ने स्वयं इस शिवलिंग की स्थापना की थी। खास बात यह है कि यह मंदिर मां पार्वती के शक्तिपीठ से भी जुड़ा है, जिससे इसका आध्यात्मिक महत्व और बढ़ जाता है।
रावण की तपस्या और वैद्यनाथ धाम की महिमा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, रावण शिवजी का परम भक्त था और चाहता था कि भगवान शिव लंका में निवास करें। इसके लिए उसने घोर तपस्या की। कई वर्षों तक उसने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर व्रत और तप किया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने रावण को एक शिवलिंग (स्वयं वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग) प्रदान किया, लेकिन एक शर्त रखी कि यह शिवलिंग अगर किसी स्थान पर एक बार ज़मीन पर रख दिया गया, तो वहीं स्थापित हो जाएगा और फिर उसे कहीं और ले जाया नहीं जा सकेगा। रावण शिवलिंग लेकर लंका की ओर रवाना हुआ। परंतु देवताओं को यह स्वीकार नहीं था कि भगवान शिव लंका में बसें। उन्होंने रावण को छलपूर्वक रोकने की योजना बनाई। भगवान विष्णु ने वरुण देव को कहा कि वह रावण के पेट में जल भर दें। रावण को जब लघुशंका का दबाव हुआ, तो उसने देवघर (झारखंड) के पास एक ग्वाले (वास्तव में भगवान विष्णु द्वारा भेजे गए गणेश जी) को शिवलिंग पकड़ाने का आग्रह किया।
गणेश जी ने रावण से कहा कि वह केवल थोड़ी देर ही शिवलिंग को पकड़ सकते हैं। जैसे ही रावण कुछ दूर गया, गणेश जी ने शिवलिंग को ज़मीन पर रख दिया। रावण लौट कर आया और उसने बहुत प्रयास किया, लेकिन शिवलिंग ज़मीन से हिला नहीं। क्रोधित होकर उसने शिवलिंग को दबाने की कोशिश की, जिससे उसका ऊपरी हिस्सा दब गया और थोड़ा टेढ़ा हो गया। यह आज भी वैद्यनाथ धाम में देखा जा सकता है।
इस धार्मिक स्थल को लेकर मान्यता है कि, जो भी भक्त सच्चे मन से सावन के महीने में वैद्यनाथ धाम में जल अर्पित करता है, उसकी हर इच्छा पूरी होती है और भगवान शिव उसे आरोग्य, समृद्धि और मोक्ष का वरदान देते हैं। इसीलिए यहां हर साल सावन में कांवड़ियों का विशाल जनसैलाब उमड़ता है। जो सुल्तानगंज से गंगा जल लेकर पैदल यात्रा करते हुए ‘बोल बम’ के जयघोष के साथ देवघर पहुंचते हैं।
श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग, उत्तराखंड

हिमालय की गोद में स्थित यह ज्योतिर्लिंग केवल आस्था ही नहीं, बल्कि साहस और तपस्या का प्रतीक भी है। 11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ तक पहुंचना आसान नहीं होता। लेकिन सावन में यहां जाकर शिव को जल चढ़ाने का पुण्य अपार फल देता है। यहीं पंचकेदारों में प्रमुख मंदिर स्थित है और मान्यता है कि स्वयं भगवान शिव ने यहां अपने त्रिकालज्ञ रूप में वास किया था।
इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि, महाभारत युद्ध के पश्चात पांडव अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए शिवजी से क्षमा मांगने हिमालय गए। लेकिन भगवान शिव उनसे रूष्ट थे और केदार क्षेत्र में एक बैल का रूप धारण कर छिप गए। पांडवों ने उन्हें पहचान लिया और भीम ने बैल के पिछले हिस्से को पकड़ लिया। उसी स्थान पर भगवान शिव ने ज्योतिर्लिंग रूप में दर्शन दिए।
विशेष मान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि केदारनाथ की पीठ केदारखंड कहलाती है और यहां की जलवायु में देवताओं की उपस्थिति मानी जाती है।
सावन में दर्शन क्यों हैं विशेष?
सावन शिव का प्रिय माह माना जाता है, क्योंकि समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष को शिव ने इसी माह में ग्रहण किया था। यही कारण है कि इस महीने में शिव का अभिषेक करना विशेष फलदायक होता है। जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और भस्म से की गई पूजा शिव को अतिप्रिय होती है। मान्यता है कि इस माह में ज्योतिर्लिंगों के दर्शन से जन्मों-जन्मों का पाप मिटता है और जीवन में सुख, स्वास्थ्य व समृद्धि आती है।
यात्रा से पहले ध्यान रखने योग्य बातें
– प्रत्येक मंदिर के दर्शन के लिए ऑनलाइन बुकिंग की व्यवस्था उपलब्ध है, सावन में भीड़ अत्यधिक होती है, इसलिए पहले से योजना बनाएं।
– मंदिर परिसर में मोबाइल, कैमरा आदि प्रतिबंधित रहते हैं।
– साफ-सुथरे वस्त्र पहनें और जल पात्र को मंदिर से बाहर ही रखें। वरिष्ठ नागरिकों व महिलाओं के लिए विशेष व्यवस्था कई स्थानों पर की जाती है। सावन सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, यह आत्मिक शुद्धि और शिव तत्व से एकात्म का अवसर है। यदि आप इस पावन माह में भगवान शिव की कृपा पाना चाहते हैं, तो इन छह पवित्र ज्योतिर्लिंगों के दर्शन अवश्य करें। यह न केवल आध्यात्मिक अनुभव कराएंगे, बल्कि जीवन को नई ऊर्जा और शांति से भर देंगे।