Pushkar Lake Video: राजस्थान के पुष्कर नगर में स्थित पुष्कर झील अत्यंत लोकप्रिय और प्रतिष्ठित तीर्थ है। इसे पुष्कर सरोवर भी कहा जाता है। यह केवल एक जलाशय नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और इतिहास का जीवंत संगम है। इसके चारों ओर बने 52 से अधिक घाट और सैकड़ों मंदिर इसे हिंदू धर्म के सबसे पवित्र तीर्थों में विशिष्ट स्थान दिलाते हैं। सदियों से यह झील श्रद्धालुओं, साधकों और यात्रियों के हृदय में विशेष स्थान बनाए हुए है।
यह कथा केवल पानी और घाटों की नहीं, बल्कि पौराणिक विश्वासों, ऐतिहासिक प्रमाणों और आज भी जीवित परंपराओं की कहानी है—एक ऐसी यात्रा, जिसमें ब्रह्मा के कमल से लेकर पुष्कर मेले की रंगीन रौनक तक सब कुछ शामिल है।
ब्रह्मा, कमल और पुष्कर की उत्पत्ति
पुष्कर की उत्पत्ति की कथा पद्म पुराण, स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण में वर्णित मिलती है। मान्यता के अनुसार, सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा ने वज्रनाभ नामक राक्षस का वध अपने कमल पुष्प से किया था। इस युद्ध के दौरान कमल की तीन पंखुड़ियाँ पृथ्वी पर गिरीं। जिन स्थानों पर ये पंखुड़ियाँ गिरीं, वहाँ ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर और कनिष्ठ पुष्कर का प्रादुर्भाव हुआ।
इनमें ज्येष्ठ पुष्कर—आज की पुष्कर झील—सबसे पवित्र मानी जाती है और यही पुष्कर नगर का आध्यात्मिक केंद्र है। मध्य और कनिष्ठ पुष्कर आज अपेक्षाकृत छोटे और कम प्रसिद्ध तीर्थ हैं, लेकिन पौराणिक महत्त्व वे भी साझा करते हैं।
यज्ञ, सावित्री और ब्रह्मा का श्राप
पौराणिक कथा के अनुसार, ब्रह्मा ने यहाँ एक विशाल यज्ञ करने का निर्णय लिया। यज्ञ के लिए पत्नी सावित्री की उपस्थिति अनिवार्य थी। लेकिन समय पर न पहुँच पाने के कारण ब्रह्मा ने गायत्री से विवाह कर यज्ञ पूर्ण किया।
जब सावित्री को यह ज्ञात हुआ, तो उन्होंने ब्रह्मा को श्राप दिया कि पृथ्वी पर उनकी औपचारिक और सार्वजनिक पूजा केवल पुष्कर में ही होगी।
यही कारण है कि पुष्कर स्थित ब्रह्मा मंदिर को विश्व का एकमात्र प्रमुख ब्रह्मा मंदिर माना जाता है।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ब्रह्मा की मूर्तियाँ और प्रतीक अन्य स्थानों पर मिलते हैं, लेकिन विधिवत सक्रिय मंदिर-पूजा परंपरा केवल पुष्कर में ही विकसित हुई।
ऐतिहासिक और पुरातात्विक संदर्भ
पुष्कर झील केवल पौराणिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुरातत्वविदों के अनुसार इसका अस्तित्व ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से भी पहले का हो सकता है।
साँची और भरहुत स्तूपों के अभिलेखों में पुष्कर क्षेत्र का संकेत मिलता है, जो इसके प्राचीन तीर्थ होने की पुष्टि करता है।
चीनी यात्री फा-शियान और ह्वेनसांग ने राजस्थान के धार्मिक केंद्रों का उल्लेख किया है, जिनसे पुष्कर की प्राचीन प्रतिष्ठा का अनुमान लगाया जाता है।
मध्यकाल में विभिन्न शासकों द्वारा जल-संरक्षण, घाट-निर्माण और मंदिर संरचनाओं का विकास किया गया, जिससे झील का स्वरूप और अधिक सुदृढ़ हुआ।
सिख परंपरा में पुष्कर
पुष्कर का महत्व केवल हिंदू धर्म तक सीमित नहीं है। सिख परंपरा में भी यह स्थान आदरणीय माना जाता है। मान्यता है कि गुरु नानक देव जी ने अपने उदासियों के दौरान यहाँ प्रवास किया था।
गुरु गोबिंद सिंह जी के पुष्कर आगमन की परंपरा भी स्थानीय स्मृतियों में जीवित है।
गोबिंद घाट के समीप स्थित गुरुद्वारा गुरु गोबिंद सिंह जी की स्मृति से जुड़ा हुआ माना जाता है।
घाट, राजपूत और मराठा योगदान
मुगल काल में कई मंदिर और घाट क्षतिग्रस्त हुए। बाद में राजपूत शासकों और मराठा सरदारों ने इनके पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- राजा मान सिंह द्वारा निर्मित राज घाट
- मराठा सरदार दौलतराव सिंधिया द्वारा कोट तीर्थ घाट का निर्माण
- जयपुर राजपरिवार द्वारा 1956 में दान स्वरूप निर्मित जयपुर घाट
इन संरचनाओं ने पुष्कर झील को केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि स्थापत्य और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में भी स्थापित किया।
प्रमुख घाटों का महत्व
- ब्रह्मा घाट – सर्वाधिक पवित्र, यज्ञ स्थल से जुड़ा हुआ
- गऊ घाट – महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री की अस्थियाँ यहाँ विसर्जित की गई थीं
- वराह घाट – भगवान विष्णु के वराह अवतार से जुड़ी मान्यता
- नट सिंह घाट – यहाँ संरक्षित भरवां मगरमच्छ ऐतिहासिक जिज्ञासा का केंद्र है, जिसे स्थानीय मान्यताओं से जोड़ा जाता है
पुष्कर मेला: आस्था और उत्सव का संगम
कार्तिक मास में लगने वाला पुष्कर ऊँट मेला विश्वप्रसिद्ध है। यह मेला धार्मिक स्नान के साथ-साथ लोक-संस्कृति, पशु व्यापार और पर्यटन का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।
राजस्थान के लोकनृत्य, लोकसंगीत, ऊँट-सजावट प्रतियोगिताएँ और धार्मिक अनुष्ठान इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाते हैं।
पंच सरोवर और तीर्थ-राज की अवधारणा
हिंदू परंपरा में पुष्कर को पंच सरोवरों में एक माना जाता है। विभिन्न ग्रंथों में पंच सरोवरों की सूचियाँ भिन्न मिलती हैं, किंतु पुष्कर सरोवर का स्थान सदैव प्रतिष्ठित रहा है।
इसी कारण पुष्कर को ‘तीर्थ-राज’—अर्थात् जल-तीर्थों का अधिपति—कहा गया है।
पर्यावरणीय संकट और संरक्षण
हाल के दशकों में पुष्कर झील को गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। 2009 में झील का लगभग सूख जाना एक गंभीर चेतावनी के रूप में सामने आया।
जल गुणवत्ता में गिरावट, उच्च BOD स्तर, सीवेज मिश्रण और अनियोजित डिसिल्टिंग ने समस्या को बढ़ाया।
सरकार द्वारा 2008 में National Lake Conservation Project के अंतर्गत लगभग 48.3 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार स्थानीय पारिस्थितिकी, जल-आवक और परंपरागत जल-स्रोतों को समग्र रूप से नहीं जोड़ा गया।
पर्यटन, सावधानी और ज़िम्मेदारी
आज पुष्कर झील एक प्रमुख पर्यटन केंद्र भी है। बाज़ार, सूर्यास्त के दृश्य और घाटों की शांति पर्यटकों को आकर्षित करती है।
लेकिन पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अवैध शुल्क, टाउट्स और स्वच्छता के प्रति सजग रहना चाहिए, क्योंकि तीर्थ की पवित्रता सामूहिक आचरण से ही सुरक्षित रहती है।
एक जीवित तीर्थ
पुष्कर झील केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि एक जीवित सांस्कृतिक परिदृश्य है। यह स्थान हमें सिखाता है कि आस्था, इतिहास और पर्यावरण—तीनों को साथ लेकर चलना ही सच्चा संरक्षण है।
यदि यह झील जीवित रहेगी, तो केवल पानी से नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना, संवेदनशीलता और ज़िम्मेदारी से।
अब प्रश्न यह है कि हम अपनी ज़िम्मेदारी कितनी गंभीरता से निभाते हैं—और क्या आने वाली पीढ़ियों के लिए इस तीर्थ-राज को सुरक्षित छोड़ पाएँगे?

