
Barsana Lathmar Holi (Image Credit-Social Media)
Barsana Lathmar Holi
Barsana Lathmar Holi: हिंदू धर्म में ‘होली’ केवल रंगों का त्योहार नहीं बल्कि आनंद, प्रेम और भक्ति का महापर्व है। जहाँ देश के अधिकांश हिस्सों में होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है वहीं ब्रजमंडल में इस उत्सव की शुरुआत ‘बसंत पंचमी’ से ही हो जाती है। यहाँ होली का उत्सव लगभग चालीस दिनों तक विभिन्न लीलाओं, समाज-गायन और मंदिर परंपराओं के साथ मनाया जाता है। ब्रज की होली अपनी विविध परंपराओं के कारण विश्वप्रसिद्ध है। इनमें सबसे विशिष्ट और आकर्षक परंपरा ‘बरसाना’ और ‘नंदगांव’ की ‘लट्ठमार होली’ है।
लड्डू होली और नंदगांव को निमंत्रण
परंपरा के अनुसार लट्ठमार होली से एक दिन पूर्व ‘लड्डू होली’ का आयोजन होता है। यह उत्सव बरसाना के ‘श्रीजी मंदिर’ जिसे ‘लाडलीजी मंदिर’ भी कहा जाता है वहाँ मनाया जाता है।
सुबह विशेष कार्यक्रमों के अंतर्गत ‘राधा रानी’ की सखियों के प्रतीक स्वरूप झाँकी निकलती है। ढोल-ताशों और जयकारों के साथ नंदगांव को होली खेलने का निमंत्रण भेजा जाता है।
ऐतिहासिक रूप से यह मान्यता है कि नंदगांव के कृष्ण और उनके सखा बरसाना आकर राधा और सखियों के साथ होली खेलते थे। इसी लीला की स्मृति में निमंत्रण और परंपरागत समाज-गायन की परंपरा आज भी निभाई जाती है।
शाम को लाडलीजी मंदिर में विश्वप्रसिद्ध ‘लड्डू होली’ होती है। सेवायत पांडे समाज-गायन करते हैं और श्रद्धालुओं पर अबीर-गुलाल के साथ लड्डू उछाले जाते हैं।
यहाँ प्रयुक्त रंग परंपरागत रूप से प्राकृतिक तत्वों से बनाए जाते हैं। हजारों देशी और विदेशी श्रद्धालु इस आयोजन के साक्षी बनते हैं।
लट्ठमार होली का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
ब्रज क्षेत्र में मनाई जाने वाली लट्ठमार होली अत्यंत अनोखी परंपरा है। इस होली में नंदगांव के पुरुष और बरसाना की महिलाएँ भाग लेती हैं।
होली के दिन महिलाएँ पारंपरिक वेशभूषा में घूँघट ओढ़कर प्रतीकात्मक रूप से पुरुषों पर लट्ठ चलाती हैं। पुरुष ढाल लेकर स्वयं को बचाते हैं।
यह दृश्य केवल हास्य या खेल नहीं बल्कि राधा-कृष्ण की प्रेम-लीला का सांकेतिक पुनर्सृजन माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाना आकर राधा और सखियों को रंग लगाते थे। सखियाँ उन्हें चुटकी लेते हुए लट्ठ से खदेड़ती थीं।
पूरा वातावरण भजन-कीर्तन, ढोल-नगाड़ों और समाज-गायन से भक्तिमय हो उठता है।
लट्ठमार होली शक्ति और प्रेम के संतुलन का प्रतीक है। इसमें स्त्री-पुरुष सहभागिता को सांस्कृतिक उत्सव के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
ब्रज होली का वैश्विक आकर्षण
बरसाना और नंदगांव की लट्ठमार होली विश्व पर्यटन मानचित्र पर विशेष स्थान रखती है। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के अनुसार प्रत्येक वर्ष लाखों श्रद्धालु और पर्यटक इस आयोजन में सम्मिलित होते हैं। विदेशी मीडिया में भी इस उत्सव की व्यापक चर्चा होती है।
यह उत्सव केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रदर्शन है। बरसाना की लट्ठमार होली प्रेम, परंपरा और भक्ति का अनोखा संगम है। यह केवल रंगों का खेल नहीं बल्कि ब्रज संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति है।
यह उत्सव हमें सिखाता है कि परंपरा जब आनंद और श्रद्धा के साथ जुड़ती है तब वह लोकजीवन का स्थायी उत्सव बन जाती है।
संदर्भ
• श्रीमद्भागवत महापुराण
• ब्रज क्षेत्र की लोक परंपराएँ
• उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग प्रकाशन
(संदर्भ: श्रीमद्भागवत १०वाँ स्कंध. ब्रज लोक-साहित्य संग्रह)
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