
Rajasthan Famous Beneshwar Dham Mandir Chamatkar Sawan Ka Somwar
Rajasthan Famous Beneshwar Dham Mandir Chamatkar Sawan Ka Somwar
Rajasthan Famous Beneshwar Dham: राजस्थान का बेणेश्वर धाम एक ऐसा तीर्थस्थल है जो न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है बल्कि अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक समृद्धि के लिए भी दुनिया भर में मशहूर है। डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिलों की सीमा पर सोम माही और जाखम नदियों के संगम पर बसा यह धाम आदिवासी समुदाय का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है। इसे आदिवासियों का हरिद्वार बागड़ का पुष्कर और मिनी काशी जैसे नामों से भी जाना जाता है। हर साल माघ महीने में यहाँ लगने वाला बेणेश्वर मेला लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। लेकिन इस धाम की खासियत सिर्फ मेले तक सीमित नहीं है। सावन के सोमवार को होने वाली एक चमत्कारी घटना जिसमें एक नाग शिवलिंग से लिपट जाता है इसे और भी अनूठा बनाती है।
बेणेश्वर धाम का परिचय

बेणेश्वर धाम डूंगरपुर जिले की आसपुर तहसील में नवाटापारा गाँव के पास सोम माही और जाखम नदियों के त्रिवेणी संगम पर स्थित है। यह स्थान डूंगरपुर शहर से लगभग 60 किलोमीटर और बांसवाड़ा से 45 किलोमीटर दूर है। तीन नदियों के बीच बने एक त्रिभुजाकार टापू पर यह धाम बसा है जिसे स्थानीय वागड़ी बोली में बेण कहा जाता है। इस टापू का क्षेत्रफल लगभग 240 बीघा है और यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देता है। खासकर मानसून में जब नदियाँ उफान पर होती हैं और हरी-भरी पहाड़ियाँ चारों ओर छा जाती हैं तो यह स्थान किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता।
धाम का मुख्य आकर्षण स्वयंभू शिवलिंग है जो बेणेश्वर महादेव के नाम से पूजा जाता है। इसके अलावा यहाँ भगवान विष्णु का मंदिर ब्रह्मा मंदिर और वाल्मीकि मंदिर भी हैं जो इस स्थान को और भी पवित्र बनाते हैं। यह धाम विशेष रूप से भील आदिवासी समुदाय की आस्था का केंद्र है जो इसे अपने तीर्थस्थल के रूप में पूजते हैं।
इतिहास और किंवदंतियाँ
बेणेश्वर धाम का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है और यह कई किंवदंतियों से जुड़ा है। मान्यता है कि यह शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ था। एक कथा के अनुसार 9वीं शताब्दी में एक साधु को सपने में भगवान शिव ने दर्शन दिए और इस स्थान पर एक शिवलिंग की मौजूदगी का संकेत दिया। जब साधु ने यहाँ खुदाई की तो एक चमकदार शिवलिंग प्रकट हुआ जिसे बाद में मंदिर के रूप में स्थापित किया गया।

इस धाम का एक और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पहलू संत मावजी महाराज से जुड़ा है। मावजी महाराज का जन्म विक्रम संवत 1771 में माघ शुक्ल पंचमी यानी बसंत पंचमी के दिन साबला गाँव में दालम ऋषि और माता केसर बाई के घर हुआ था। उन्होंने कठोर तपस्या की और विक्रम संवत 1784 में माघ शुक्ल एकादशी को लीलावतार के रूप में दुनिया के सामने आए। स्थानीय लोग उन्हें भगवान विष्णु का अवतार मानते हैं। मावजी महाराज ने साम्राज्यवाद के अंत प्रजातंत्र की स्थापना और सामाजिक सुधारों की भविष्यवाणियाँ की थीं जो आज भी प्रासंगिक हैं। उनके तप के कारण ही बेणेश्वर धाम को एक पवित्र तीर्थ के रूप में स्थापित किया गया।
एक अन्य कथा के अनुसार मावजी महाराज ने यहाँ रासलीला रचाई थी और इसीलिए यहाँ भगवान विष्णु का मंदिर भी बनाया गया। उनकी बहू जन्कुंवारी ने विष्णु मंदिर की स्थापना की और उनके दो शिष्यों अजे और वजे ने लक्ष्मी-नारायण मंदिर बनवाया। ये मंदिर आज भी धाम की शोभा बढ़ाते हैं।
सावन सोमवार का चमत्कार
बेणेश्वर धाम की सबसे अनूठी बात सावन के सोमवार को होने वाली चमत्कारी घटना है। कहा जाता है कि हर सावन सोमवार को सुबह के समय एक नाग मंदिर में प्रकट होता है और स्वयंभू शिवलिंग से लिपट जाता है। यह नाग कुछ देर तक शिवलिंग के चारों ओर रहता है और फिर गायब हो जाता है। यह घटना भक्तों के लिए आश्चर्य और श्रद्धा का विषय है। स्थानीय लोग और पुजारी इसे भगवान शिव और नागदेवता की कृपा का प्रतीक मानते हैं।
कुछ का मानना है कि यह नाग स्वयं भगवान शिव का एक रूप है जो अपने भक्तों को दर्शन देने आता है। दूसरों का कहना है कि यह नागदेवता हैं जो शिवलिंग की रक्षा करते हैं। 2024 में एक स्थानीय समाचार चैनल ने इस घटना का वीडियो प्रसारित किया था जिसमें साफ दिखा कि एक नाग शिवलिंग से लिपटा हुआ है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ और बेणेश्वर धाम की प्रसिद्धि को चार चाँद लग गए। सावन के सोमवार को इस चमत्कार को देखने के लिए दूर-दूर से भक्त यहाँ आते हैं और इसे अपने जीवन का एक खास पल मानते हैं।
वास्तुकला

बेणेश्वर धाम का शिव मंदिर अपनी सादगी भरी वास्तुकला के लिए जाना जाता है। मंदिर का निर्माण पारंपरिक राजस्थानी शैली में हुआ है लेकिन यह ज्यादा भव्य नहीं है। मुख्य गर्भगृह में स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है जो काले पत्थर से बना है और इसकी सतह चमकदार और चिकनी है। मंदिर की दीवारों पर साधारण नक्काशी है जो शिव-पार्वती गणेश और अन्य पौराणिक दृश्यों को दर्शाती है।
मंदिर का प्रांगण खुला और विशाल है जो नदियों के संगम के ठीक किनारे पर बसा है। मंदिर के पास एक छोटा सा कुंड है जिसमें भक्त स्नान करते हैं। विष्णु मंदिर और अन्य छोटे मंदिर भी परिसर में हैं जो स्थानीय कला और शिल्प को दर्शाते हैं। मानसून में जब नदियाँ उफान पर होती हैं तो मंदिर एक टापू की तरह दिखता है जो इसकी सुंदरता को और बढ़ाता है। मंदिर को फूलों और रंग-बिरंगी सजावट से सजाया जाता है खासकर सावन और माघ महीने में।
सांस्कृतिक महत्व
बेणेश्वर धाम का सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा है। यहाँ का मेला जो माघ शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक चलता है आदिवासी संस्कृति का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। यह मेला लगभग 300 साल पुराना है और इसे आदिवासियों का कुंभ कहा जाता है। राजस्थान मध्य प्रदेश गुजरात और महाराष्ट्र से लाखों भील और अन्य आदिवासी समुदाय के लोग यहाँ आते हैं। मेले में पारंपरिक नृत्य जैसे गैर और गवरी गीत और खेल जैसे सितोलिया रस्साकशी और गिल्ली-डंडा आयोजित होते हैं।
यह मेला न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। यहाँ लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सजकर आते हैं और सामूहिक रूप से स्नान तर्पण और पूजा करते हैं। मृतकों की अस्थियों का विसर्जन भी इस संगम पर किया जाता है जिसे मुक्तिदायक माना जाता है। मावजी महाराज की शिक्षाएँ और उनकी भविष्यवाणियाँ यहाँ के लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
सावन के सोमवार को यहाँ का माहौल और भी भक्तिमय हो जाता है। भक्त काँवड़ लेकर नदियों से जल लाते हैं और शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। हर हर महादेव के उद्घोष से पूरा परिसर गूंज उठता है। यहाँ की यह चमत्कारी घटना आदिवासी संस्कृति और शिव भक्ति का अनूठा संगम है।
धार्मिक प्रथाएँ और पूजा

बेणेश्वर धाम में पूजा की कई प्रथाएँ हैं। मंदिर सुबह 5 बजे से रात 11 बजे तक खुला रहता है। सुबह शिवलिंग को स्नान कराया जाता है और केसर का भोग लगाया जाता है। इसके बाद अगरबत्ती की आरती होती है। सावन के सोमवार को यहाँ विशेष रुद्राभिषेक और जलाभिषेक होता है। भक्त दूध बेलपत्र और फूल चढ़ाते हैं। माघ मेले के दौरान यहाँ सामूहिक भोग और तर्पण की परंपरा है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार अगर सोम नदी में पहले जल का प्रवाह होता है तो चावल की फसल अच्छी होती है। लेकिन अगर माही नदी पहले उफान पर आती है तो इसे अशुभ माना जाता है। यह मान्यता यहाँ की सांस्कृतिक और कृषि परंपराओं से जुड़ी है।
पर्यटन के दृष्टिकोण से
बेणेश्वर धाम पर्यटकों के लिए भी एक बड़ा आकर्षण है। यह डूंगरपुर से 60 किलोमीटर और उदयपुर से 150 किलोमीटर दूर है। नजदीकी रेलवे स्टेशन डूंगरपुर और हवाई अड्डा उदयपुर में है। यहाँ तक बस और टैक्सी से आसानी से पहुँचा जा सकता है। मंदिर के आसपास धर्मशालाएँ और गेस्ट हाउस उपलब्ध हैं।
मानसून और माघ महीना यहाँ घूमने का सबसे अच्छा समय है। सावन में नदियों का संगम और हरियाली पर्यटकों को लुभाती है। माघ मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रम और आदिवासी जीवनशैली का अनुभव एक अलग ही आनंद देता है। आसपास के पर्यटन स्थल जैसे गलियाकोट की दरगाह और उदयपुर की झीलें भी यात्रा को और यादगार बनाते हैं।
वर्तमान स्थिति और संरक्षण
बेणेश्वर धाम का प्रबंधन स्थानीय ट्रस्ट और जिला प्रशासन करता है। माघ मेले के दौरान सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे ड्रोन और पुलिस तैनात की जाती है। 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यहाँ का दौरा किया और आदिवासी महिलाओं की उद्यमशीलता की सराहना की। यह घटना धाम की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान को दर्शाती है।
हालांकि मानसून में सड़कों के डूबने से यहाँ पहुँचना मुश्किल हो जाता है। प्रशासन इसे बेहतर करने के लिए काम कर रहा है। मंदिर का रखरखाव और चमत्कारी घटना का संरक्षण यहाँ के पुजारियों और स्थानीय लोगों की प्राथमिकता है।
बेणेश्वर धाम राजस्थान का एक ऐसा तीर्थस्थल है जो आस्था प्रकृति और संस्कृति का अनूठा संगम है। सावन के सोमवार को होने वाला नाग का चमत्कार इसे और भी खास बनाता है। स्वयंभू शिवलिंग मावजी महाराज की तपोभूमि और त्रिवेणी संगम इस धाम को धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं। माघ मेला और आदिवासी संस्कृति यहाँ की जीवंतता को दर्शाते हैं। अगर आप धार्मिक यात्रा और प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेना चाहते हैं तो बेणेश्वर धाम जरूर जाएँ। यहाँ का शांत वातावरण और चमत्कारी अनुभव आपके मन को भक्ति और सुकून से भर देगा।