
Jabalpur Chausath Yogini Temple Mysterious Story (Image Credit-Social Media)
Jabalpur Chausath Yogini Temple Mysterious Story (Image Credit-Social Media)
Chausath Yogini Temple Mysterious Story: जबलपुर, मध्य प्रदेश का एक ऐसा शहर है, जो नर्मदा नदी की गोद में बसा है। यह शहर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, जैसे भेड़ाघाट की संगमरमरी चट्टानें और धुआंधार जलप्रपात, के साथ-साथ अपने ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के लिए भी जाना जाता है। इनमें से एक है चौसठ योगिनी मंदिर, जो न सिर्फ जबलपुर बल्कि पूरे भारत में अपनी अनूठी वास्तुकला, तांत्रिक महत्व और रहस्यमयी कहानियों के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय संस्कृति, तंत्र-मंत्र और इतिहास का एक जीवंत प्रतीक है। आइए, इस मंदिर की कहानी को और गहराई से जानते हैं, जिसमें इसके इतिहास, वास्तुकला, आध्यात्मिकता और कुछ अनसुनी कहानियों का जिक्र होगा।
चौसठ योगिनी मंदिर का परिचय
जबलपुर के भेड़ाघाट क्षेत्र में, नर्मदा नदी के तट पर एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है चौसठ योगिनी मंदिर। इसे स्थानीय लोग गोलकी मठ भी कहते हैं। यह भारत के उन चार चौसठ योगिनी मंदिरों में से एक है, जो अपनी गोलाकार संरचना और तांत्रिक महत्व के लिए मशहूर हैं। मध्य प्रदेश में दो (जबलपुर और मुरैना) और ओडिशा में दो ऐसे मंदिर हैं। लेकिन जबलपुर का यह मंदिर अपनी कुछ खास विशेषताओं के कारण सबसे अलग है।

मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 150 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह चढ़ाई अपने आप में एक रोमांचक अनुभव है, क्योंकि रास्ते में नर्मदा का शांत प्रवाह और आसपास की हरियाली मन को मोह लेती है। मंदिर का गोलाकार प्रांगण, जिसका आंतरिक व्यास 116 फीट और बाहरी व्यास 131 फीट है, इसे अन्य मंदिरों से अलग करता है। इसकी सबसे अनोखी बात यह है कि जहां ज्यादातर चौसठ योगिनी मंदिरों में 64 कक्ष होते हैं, इस मंदिर में 81 कक्ष हैं। यह विशेषता इसे और रहस्यमयी बनाती है।
मंदिर का ऐतिहासिक महत्व
चौसठ योगिनी मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी में कलचुरी राजवंश के शासक युवराजदेव प्रथम ने करवाया था। बाद में 12वीं शताब्दी में गुजरात की रानी गोसलदेवी ने मंदिर के बीच में गौरी-शंकर मंदिर बनवाया। एक शिलालेख के अनुसार, 1155 ईस्वी में राजा गयाकर्ण की विधवा पत्नी, रानी अलहनादेवी ने अपने बेटे नरसिम्हादेव के शासनकाल में इस मंदिर को और भव्य बनाया।
यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल ही नहीं था, बल्कि एक शैक्षणिक और सांस्कृतिक केंद्र भी था। प्राचीन काल में यह तंत्र-मंत्र, ज्योतिष, गणित और आयुर्वेद का प्रमुख केंद्र था। इसे तांत्रिक विश्वविद्यालय के नाम से भी जाना जाता था, जहां देश-विदेश से साधक और विद्वान ज्ञान अर्जन के लिए आते थे। मंदिर की संरचना सूर्य के गोचर के आधार पर बनाई गई थी, जिससे ज्योतिष और गणित की शिक्षा दी जाती थी। यह मंदिर उस समय की उन्नत वैज्ञानिक और आध्यात्मिक समझ को दर्शाता है।
मंदिर की वास्तुकला
चौसठ योगिनी मंदिर की वास्तुकला अपने आप में एक अनोखा नमूना है। यह गोलाकार मंदिर खुली छत के साथ बनाया गया है, जो तांत्रिक पूजा के लिए आदर्श है। तंत्र साधना में प्रकृति के पांच तत्वों – अग्नि, जल, पृथ्वी, वायु और आकाश – की पूजा महत्वपूर्ण होती है, और इस मंदिर का खुला डिजाइन इस उद्देश्य को पूरा करता है। मंदिर में 84 वर्गाकार खंभे हैं, जो 81 कक्षों को सहारा देते हैं। प्रत्येक कक्ष में एक योगिनी की मूर्ति थी, हालांकि समय के साथ कई मूर्तियां खंडित हो चुकी हैं।

मंदिर के केंद्र में गौरी-शंकर मंदिर है, जहां भगवान शिव और माता पार्वती की एक दुर्लभ मूर्ति स्थापित है। इस मूर्ति में शिव और पार्वती नंदी पर सवार हैं, जो उनके विवाह के दृश्य को दर्शाता है। यह दृश्य भारतीय मंदिरों में कम ही देखने को मिलता है। मंदिर की दीवारों पर बनी नक्काशी और मूर्तियां प्राचीन भारतीय कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। मंदिर के बाहर एक विशाल शिवलिंग और गणेश व काली की मूर्तियां भी हैं, जो इसे और आकर्षक बनाती हैं।
धार्मिक और तांत्रिक महत्व
चौसठ योगिनी मंदिर का तांत्रिक महत्व आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय है। माना जाता है कि योगिनियां मां काली या दुर्गा का अवतार हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार, मां दुर्गा ने घोर नामक राक्षस का वध करने के लिए 64 योगिनियों का रूप धारण किया था। इन योगिनियों की पूजा से तंत्र-मंत्र में सिद्धि प्राप्त होती है। स्थानीय लोग मानते हैं कि यह मंदिर आज भी भगवान शिव की तांत्रिक शक्ति के कवच से सुरक्षित है। यही कारण है कि रात में यहां रुकने की अनुमति नहीं दी जाती।
पुराने समय में यह मंदिर तंत्र साधना का एक प्रमुख केंद्र था। अमावस्या और पूर्णिमा के दिन यहां विशेष पूजा-अर्चना होती थी। हालांकि, मुगल आक्रमणों के बाद तंत्र साधना की परंपरा कम हो गई, लेकिन मंदिर का आध्यात्मिक महत्व आज भी कायम है। भक्तों का मानना है कि यहां सच्चे मन से की गई पूजा से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
औरंगजेब और मंदिर की कहानी
चौसठ योगिनी मंदिर की कहानी में एक रोचक और विवादास्पद अध्याय औरंगजेब से जुड़ा है। कहा जाता है कि औरंगजेब ने इस मंदिर पर हमला किया और कई योगिनी मूर्तियों को खंडित कर दिया। लेकिन जब वह गौरी-शंकर मंदिर के गर्भगृह में पहुंचा, तो उसे वहां से भागना पड़ा। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मंदिर की divine शक्ति ने उसे ऐसा करने से रोका। यह कहानी मंदिर की आध्यात्मिक शक्ति को और बढ़ाती है।
एक अन्य कथा के अनुसार, नर्मदा नदी ने इस मंदिर के लिए अपनी दिशा बदली थी, ताकि भक्तों को यहां पहुंचने में आसानी हो। यह कहानी मंदिर के प्रति लोगों की आस्था को और गहरा करती है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि मंदिर के आसपास की नर्मदा का पानी विशेष ऊर्जा से युक्त है, जिसे पीने से मानसिक शांति मिलती है।
मंदिर से जुड़ी कुछ अनसुनी कहानियां
चौसठ योगिनी मंदिर न सिर्फ अपने इतिहास और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इससे जुड़ी कुछ अनसुनी कहानियां भी इसे और रोचक बनाती हैं।

रहस्यमयी ऊर्जा: स्थानीय लोगों का मानना है कि मंदिर में रात के समय योगिनियों की आत्माएं सक्रिय हो जाती हैं। कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने रात में मंदिर के आसपास अजीब सी आवाजें सुनी हैं। हालांकि, यह सच है या सिर्फ अफवाह, लेकिन यह कहानी मंदिर के रहस्य को और बढ़ाती है।
तांत्रिक साधकों का अड्डा: मध्यकाल में यह मंदिर तांत्रिक साधकों का पसंदीदा स्थान था। कहा जाता है कि यहां साधना करने वाले साधक अलौकिक शक्तियां प्राप्त करते थे। कुछ लोग मानते हैं कि मंदिर के नीचे एक गुप्त कक्ष है, जहां तांत्रिक साधना के रहस्य छिपे हैं।
सूर्य और चंद्रमा की गणना: मंदिर की गोलाकार संरचना सूर्य और चंद्रमा के गोचर पर आधारित थी। प्राचीन काल में यहां खगोलशास्त्र की पढ़ाई भी होती थी। कुछ विद्वानों का मानना है कि मंदिर के खंभों की संख्या और उनकी स्थिति ग्रहों की चाल से संबंधित है।
पर्यटन स्थल के रूप में महत्व
चौसठ योगिनी मंदिर आज जबलपुर का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। यह न सिर्फ धार्मिक यात्रियों, बल्कि इतिहास और वास्तुकला प्रेमियों को भी आकर्षित करता है। मंदिर के चारों ओर फैली हरी-भरी पहाड़ियां और नर्मदा नदी का शानदार नजारा इसे और खूबसूरत बनाता है। खासकर सूर्यास्त के समय, जब सूरज की किरणें मंदिर की दीवारों पर पड़ती हैं, तो यह नजारा देखने लायक होता है।
मंदिर तक पहुंचने के लिए जबलपुर शहर से भेड़ाघाट लगभग 20 किलोमीटर दूर है। जबलपुर का डुमना हवाई अड्डा मंदिर से 34 किलोमीटर और रेलवे स्टेशन 22 किलोमीटर दूर है। सड़क मार्ग से भी मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। मंदिर के पास छोटी-छोटी दुकानें हैं, जहां से भक्त प्रसाद और स्थानीय हस्तशिल्प खरीद सकते हैं। मंदिर के आसपास बेल के पेड़ और बैठने की व्यवस्था भी पर्यटकों के लिए सुविधाजनक है।
मंदिर के पास ही भेड़ाघाट की संगमरमरी चट्टानें और धुआंधार जलप्रपात हैं, जो पर्यटकों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। आप मंदिर के दर्शन के बाद नर्मदा में नौका विहार का आनंद ले सकते हैं। यह अनुभव आपको प्रकृति और आध्यात्मिकता के करीब ले जाएगा।
मंदिर की वर्तमान स्थिति
चौसठ योगिनी मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है। हालांकि, कई योगिनी मूर्तियां खंडित अवस्था में हैं, फिर भी मंदिर अपनी प्राचीनता और आध्यात्मिक ऊर्जा को बरकरार रखे हुए है। मंदिर की देखरेख के लिए पुजारी और स्थानीय लोग सक्रिय रहते हैं। हर साल महाशिवरात्रि, नवरात्रि और दीपावली जैसे पर्वों पर यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है, जिसके लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं।
मंदिर के आसपास की गतिविधियां

चौसठ योगिनी मंदिर के दर्शन के बाद आप जबलपुर के अन्य पर्यटक स्थलों को भी देख सकते हैं। भेड़ाघाट की संगमरमरी चट्टानें, जहां नर्मदा का पानी चांदनी रात में चमकता है, पर्यटकों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। धुआंधार जलप्रपात की गर्जना और वहां का रोमांचक नजारा भी देखने लायक है। इसके अलावा, जबलपुर में मदन महल किला, रानी दुर्गावती संग्रहालय और तिलवारा घाट जैसे स्थान भी घूमने के लिए बेहतरीन हैं।
मंदिर के पास स्थानीय व्यंजनों का लुत्फ भी उठाया जा सकता है। जबलपुर की मशहूर जलेबी, पोहा और भुट्टे का कीस जैसे व्यंजन आपको स्थानीय स्वाद से रूबरू कराएंगे। मंदिर के आसपास की छोटी-छोटी दुकानों पर आप हस्तशिल्प की वस्तुएं, जैसे मिट्टी के बर्तन और पारंपरिक गहने, भी खरीद सकते हैं।
जबलपुर का चौसठ योगिनी मंदिर एक ऐसी जगह है, जहां इतिहास, आध्यात्मिकता और रहस्य का अनोखा मेल होता है। इसकी गोलाकार संरचना, प्राचीन मूर्तियां और नर्मदा के किनारे की खूबसूरती इसे एक अविस्मरणीय स्थान बनाती है। यह मंदिर न केवल भक्तों के लिए, बल्कि उन लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है, जो इतिहास, तंत्र-मंत्र और प्राचीन भारतीय कला के प्रति उत्सुक हैं। अगर आप जबलपुर की सैर पर हैं, तो इस मंदिर का दौरा जरूर करें। यहां की सीढ़ियां चढ़ते वक्त, योगिनियों की मूर्तियों को देखते हुए और नर्मदा के किनारे बैठकर आप उस प्राचीन काल की सैर कर पाएंगे, जब यह मंदिर ज्ञान, शक्ति और आध्यात्मिकता का केंद्र हुआ करता था।