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    Home » Delhi Ka Itihas: प्राचीन काल से आधुनिक युग तक दिल्ली के दिल में बसती हैं ये हवेलियां, आज बन चुकी हैं सांस्कृतिक धरोहरें
    Tourism

    Delhi Ka Itihas: प्राचीन काल से आधुनिक युग तक दिल्ली के दिल में बसती हैं ये हवेलियां, आज बन चुकी हैं सांस्कृतिक धरोहरें

    By February 21, 2025No Comments11 Mins Read
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    Delhi Famous Historical Havelis History

    Delhi Famous Historical Havelis History

    Delhi Famous Historical Haveliyan: दिल्ली ऐतिहासिक धरोहरों का एक विशाल खजाना है, जो विभिन्न राजवंशों और संस्कृतियों की अमूल्य विरासत को संजोए हुए है। इसकी ऐतिहासिक विरासते इसे भारत की सबसे समृद्ध राजधानी बनाती है। दिल्ली की धरोहरें महाभारत काल की इंद्रप्रस्थ नगरी से लेकर आधुनिक ब्रिटिश और स्वतंत्रता संग्राम के युग तक फैली हुई हैं। यह शहर कई राजवंशों जैसे कि मौर्य, गुप्त, दिल्ली सल्तनत, मुग़ल और ब्रिटिश शासन का केंद्र रहा है। दिल्ली में मौजूद तीन स्थल कुतुब मीनार परिसर (13वीं शताब्दी),

    हुमायूं का मकबरा (16वीं शताब्दी) और लाल किला (17वीं शताब्दी) युनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं, जो इसकी ऐतिहासिक मजबूती को दर्शाते हैं। इसके अलावा मुगलकालीन और सल्तनतकालीन इमारतों की बात करे तो इसमें पुराना किला, फिरोज शाह कोटला, जामा मस्जिद, सफदरजंग का मकबरा

    इन इमारतों का निर्माण मजबूत पत्थरों, लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से हुआ है, जो आज भी सुरक्षित हैं। ब्रिटिश और आधुनिक भारत की धरोहरों में राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट, संसद भवन, कनॉट प्लेस जैसी इमारतें औपनिवेशिक और आधुनिक स्थापत्य कला का उदाहरण हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और दिल्ली हेरिटेज मैनेजमेंट संस्थान जैसी संस्थाएं मौजूदा समय में इन धरोहरों के संरक्षण के लिए कार्य कर रही हैं। जिनमें कुछ और पुरानी इमारतें उपेक्षा का शिकार हो रहीं हैं, लेकिन सरकार और स्थानीय संगठनों द्वारा इन्हें पुनर्जीवित करने के प्रयास जारी हैं।

    हालांकि, बढ़ती आबादी, शहरीकरण और प्रदूषण के कारण कई धरोहरें खतरे में भी हैं। संरक्षण के निरंतर प्रयासों से यह धरोहरें आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रखी जा सकती हैं। इन ऐतिहासिक इमारतों के बीच हम दिल्ली के दिल में बसी हवेलियों का जिक्र करना कैसे भूल सकते हैं। एक समय में जब मुगल दिल्ली पर राज किया करते थे तब पुरानी दिल्ली का इलाका महलों और हवेलियों से भरा हुआ था। ये वो समय था जब दिल्ली की खूबसूरती इन्हीं हवेलियों से देखी जाती थीं। आज पुरानी दिल्ली के इलाकों में तंग गलियां और दुकानें हैं, लेकिन आपको पता नहीं होगा कि इनके बीच में ही ना जाने कितनी हवेलियां अभी भी मौजूद है। दिल्ली की पुरानी हवेलियाँ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य कला की अनमोल धरोहर हैं। ये हवेलियाँ मुख्यतः मुगल, ब्रिटिश और उत्तर-आधुनिक काल की हैं और इनमें से कई अब भी अपनी भव्यता और ऐतिहासिक महत्त्व को दर्शाती हैं। आइए जानते हैं दिल्ली में मौजूद में ओल्ड हेरिटेज हवेलियों के बारे में –

    हवेली शरीफ मंजिल

    हवेली शरीफ मंजिल के संस्थापक हकीम शरीफ खान थे, जो अपने समय के प्रसिद्ध यूनानी चिकित्सा विशेषज्ञ थे। उनके वंशजों में हकीम महमूद खान और हकीम अजमल खान जैसे प्रतिष्ठित चिकित्सक शामिल हैं। हकीम अजमल खान ने करोल बाग में तिब्बिया कॉलेज की स्थापना की थी। यह 300 साल पुरानी हवेली है, हवेली शरीफ मंजिल जिसे खानदान-ए-शरीफी द्वारा संजोकर रखा गया है। इसी खानदान के लोग आज भी यहां रहते हैं। समरकंद से भारत आकर बसे खानदान-ए-शरीफी ने इस हवेली की गरिमा को खोने नहीं दिया।जहां कई हवेलियों को कई शाही परिवार छोड़कर चले गए, वहीं एक हवेली ऐसी भी है जिसे आज भी संजो कर रखा गया है। हवेली शरीफ मंजिल न केवल एक वास्तुकला का नमूना है, बल्कि यह यूनानी चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में परिवार के योगदान का भी प्रतीक है।

    मिर्जा गालिब की हवेली

    मिर्जा गालिब की हवेली पुरानी दिल्ली के बल्लिमारान इलाके में स्थित है। यह प्रसिद्ध उर्दू शायर मिर्जा असदुल्ला खान गालिब (1797-1869) का निवास स्थान थी। यह हवेली न केवल उनकी यादों को संजोए हुए है, बल्कि उर्दू साहित्य और मुगलकालीन दिल्ली की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक भी है। आगरा से आने के बाद मशहूर शायर मिर्जा गालिब इसी हवेली में रहे थे। यहीं रहते हुए उन्होंने ’दीवान ए ग़ालिब’ भी लिखी थी। इस हवेली को एक हकीम ने मिर्जा गालिब को दिया था। कहा जाता है कि उनके मरने के बाद हकीम इस हवेली के बाहर बैठा करते थे और फिर वहीं से लोगों को इस हवेली के अंदर नहीं घुसने देता था। 1999 तक इस हवेली पर कई तरह के अतिक्रमण किए गए थे और अंदर दुकानें भी चलती थीं। बाद में सरकार ने इस हवेली का एक हिस्सा लेकर इसे रिस्टोर करवाया और फिर इसे दिल्ली हेरिटेज वॉक का हिस्सा बना दिया। इस हवेली में मुगल काल की लखोरी ईंट लगी हुई है। शाहजहां के दौर में इन ईंटों का ही इस्तेमाल होता था। अब यह हवेली एक म्यूजियम बन गई है और यहां मिर्जा गालिब के समय की लगभग 2000 चीजें मौजूद हैं।मिर्जा गालिब की हवेली न केवल उनके जीवन और काव्य की झलक देती है, बल्कि यह दिल्ली की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत का भी अभिन्न हिस्सा है। यदि आप उर्दू साहित्य और इतिहास में रुचि रखते हैं, तो यह स्थान जरूर देखने लायक है।

    खजानची हवेली

    खजानची हवेली पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक क्षेत्र में स्थित एक ऐतिहासिक भवन है, जो मुगलकालीन वास्तुकला और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है।यह हवेली अब काफी हद तक खंडहर हो चुकी है, लेकिन इसकी दीवारों पर बनी नक्काशियां, खिड़कियों के झरोंखे और इसका बड़ा सा आंगन अभी भी इतिहास की एक झलक जरूर देता है। इस हवेली को प्राइम वीडियो सीरीज ’मेड इन हेवेन’ में भी दिखाया गया है। दिल्ली के शाहजहानाबाद में स्थित यह हवेली भी उस इलाके की बाकी हवेलियों की तरह ही समय की मार खा चुकी है। जैसा की इसका नाम है, इस हवेली को मुगल बादशाह शाहजहां के खजानचियों के लिए बनवाया गया था। यहीं पर मुगल काल के पैसों का लेनदेन और उसका हिसाब होता था। मुगल काल में आए सिक्के, मोहरें और दस्तावेज यहीं से जाते थे। माना जाता है कि लाल किले से इस हवेली तक पहुंचने के लिए एक सुरंग भी थी। समय के साथ, खजानची हवेली की स्थिति में परिवर्तन आया है हालांकि, यह भवन अभी भी पुरानी दिल्ली की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

    हवेली धरमपुरा

    हवेली धर्मपुरा, जिसे शाहजहानाबाद की विरासत हवेली भी कहा जाता है, पुरानी दिल्ली के ऐतिहासिक गलियारों में स्थित एक भव्य हवेली है। यह हवेली 19वीं शताब्दी में बनाई गई थी और इसे पुरानी दिल्ली की शानदार वास्तुकला और संस्कृति को संरक्षित करने के लिए पुनर्निर्मित किया गया है। इसे 1887 में बनाया गया था और जब इसकी हालत खराब होने लगी, तब इसे छोड़ दिया गया। इसकी हालत इतनी खराब हो गई थी कि इसे दिल्ली मुंसिपल कॉरपोरेशन द्वारा, खतरनाक बिल्डिंग्स की लिस्ट में शामिल कर दिया गया था। इसे रिस्टोर करने में भी 6 साल लग गए थे और अब यह खूबसूरत हवेली दिल्ली की शान बनकर खड़ी है। 2010 तक यह हवेली खंडहर बन चुकी थी और पूरी तरह जर्जर अवस्था में थी।

    इसे भारतीय संसद सदस्य विजय गोयल ने खरीदा और 6 साल के गहन पुनर्स्थापना कार्य के बाद 2016 में इसे एक हेरिटेज होटल के रूप में पुनः स्थापित किया। अब इस हवेली में आप कथक डांस परफॉर्मेंस भी देख सकते हैं। दिल्ली की यह हवेली अब यूनेस्को की हेरिटेज साइट बन चुकी है। अब यह एक रॉयल होटल के रूप में देखी जाती है। मुगल काल की इस हवेली को बखूबी सजाया और संवारा गया है।

    कथिका कल्चर सेंटर

    कथिका कल्चर सेंटर पुरानी दिल्ली की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने और उसे आधुनिक पीढ़ी तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। यह स्थान इतिहास, कला, और संस्कृति के प्रेमियों के लिए अवश्य देखने योग्य है। यह पुरानी दिल्ली के सीता राम बाजार इलाके में स्थित है। इस हवेली के दरवाजों से लेकर इसकी दीवारों तक आपको इतिहास की एक खूबसूरत झलक देखने को मिल जाएगी। अगर आप इस म्यूजियम में जाते हैं, तो आपको पुरानी दुर्लभ तस्वीरें भी मिल जाएंगी। यहां विंटेज आर्ट डेकोरेटिव वस्तुएं संरक्षित हैं। अगर आपको आर्ट एंड कल्चर का शौक है, तो आप इस जगह जरूर जा सकते हैं।अगर इतिहास को दोबारा जीवित करने की बात की गई है, तो कथिका कल्चर सेंटर की बात जरूर होगी। अब इसका नाम है कथिका जो एक म्यूजियम और कल्चर सेंटर भी है।

    कथिका का उद्देश्य दिल्ली की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करना और उसे मनाना है। यहां पुरानी दिल्ली की गंगा-जमुनी तहज़ीब को दर्शाने वाले पुराने दर्पण, टाइपराइटर, और अन्य कलात्मक वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं। इनमें से अधिकांश संस्थापक अतुल खन्ना के निजी संग्रह से हैं, जबकि कुछ वस्तुएं मित्रों और परिचितों द्वारा दान की गई हैं। कथिका में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों, कार्यशालाओं, पाक कला अनुभवों, और हेरिटेज बैठकों के लिए विशेष स्थान उपलब्ध हैं। यहां दुर्लभ पुरालेखीय फोटोग्राफ, विंटेज सजावटी कला वस्तुएं, और हस्तशिल्प का संग्रह है, जो आपको अतीत की यात्रा पर ले जाता है।

    चुन्नामल हवेली

    यह हवेली चांदनी चौक में स्थित सबसे बड़ी और बेहतरीन संरक्षित हवेलियों में से एक है। इसमें 128 कमरे हैं, जो भव्य मुगल और राजस्थानी स्थापत्य शैली का मिश्रण हैं।

    लकड़ी के सुंदर नक्काशीदार दरवाजे, ऊँची छतें, बड़े-बड़े झरोखे और विस्तृत आंगन हवेली की खास पहचान हैं।

    हवेली में पुराने झूमर, बेल्जियन शीशे और पारंपरिक फर्नीचर अब भी मौजूद हैं।

    इसमें कई विशाल बरामदे और आंतरिक गलियारे हैं, जो उस समय की भव्य जीवनशैली को दर्शाते हैं। हर महीने यहां कई टूरिस्ट्स आते हैं और इस हवेली का दीदार करके जाते हैं।

    इसमें मुगल और ब्रिटिश दोनों तरह का आर्किटेक्चर मिल जाएगा जो दिखाता है कि कैसे भारत मुगलों के दौर से निकल कर ब्रिटिश राज की तरफ बढ़ रहा था। इस हवेली में बॉलीवुड फिल्म ’दिल्ली -6’ और हॉलीवुड फिल्म ’होली स्मोक’ शूट हुई हैं।

    यह हवेली लाला चुन्नामल द्वारा 19वीं शताब्दी में बनवाई गई थी। लाला चुन्नामल उस समय के सबसे अमीर व्यापारियों में से एक थे और उन्होंने कपड़ा व्यापार से अपार संपत्ति अर्जित की थी। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद, जब दिल्ली में व्यापार और प्रशासनिक गतिविधियाँ ठप हो गईं, तब लाला चुन्नामल और उनका परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध बना रहा।

    वे अंग्रेजों के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखने में सफल रहे, जिससे उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति मजबूत बनी रही।

    बेगम समरू की हवेली

    भगीरथ पैलेस, चांदनी चौक स्थित यह हवेली 18वीं सदी में एक प्रसिद्ध महिला योद्धा और व्यापारी बेगम समरू की थी। बाद में इसे ब्रिटिश शासन के दौरान एक व्यापारिक केंद्र में बदल दिया गया। बेगम समरू (जन्मः 1753, मृत्युः 1836) मूल रूप से एक नर्तकी थीं, लेकिन बाद में वे एक शासक और सैन्य नेता बनीं।

    उनका असली नाम फरज़ाना ज़ेबुन्निसा था। उन्होंने एक यूरोपीय भाड़े के सैनिक वॉल्टर रेनहार्ड समरू से विवाह किया, जिसके बाद उन्हें “बेगम समरू“ के नाम से जाना जाने लगा। उनके पति की मृत्यु के बाद, उन्होंने मेरठ के पास स्थित सरधना की जागीर की शासक के रूप में शासन किया और एक शक्तिशाली महिला नेता के रूप में उभरीं। वे दिल्ली के मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय की सहयोगी थीं और उनकी सेना को समर्थन देती थीं।

    हकीम आशिक अली की हवेली

    हकीम आशिक अली की हवेली दिल्ली की ऐतिहासिक धरोहरों में से एक है, जो मुगलकालीन चिकित्सा प्रणाली और उस दौर के समाज में यूनानी चिकित्सा पद्धति की महत्ता को दर्शाती है। यह हवेली दिल्ली के दरियागंज क्षेत्र में स्थित है और 19वीं शताब्दी की शाही और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानी जाती है। इस हवेली का वास्तुशिल्प और इसकी जटिल लकड़ी की नक्काशी इसे विशेष बनाती है। हकीम आशिक अली अपने समय के प्रसिद्ध यूनानी चिकित्सा विशेषज्ञ (हकीम) थे।

    वे दिल्ली के प्रतिष्ठित हकीम परिवार से ताल्लुक रखते थे, जिनकी जड़ें मुगलकाल से जुड़ी हुई थीं। उनका परिवार मुगल दरबार से संबंधित था और वे शाही परिवारों एवं आम जनता के लिए यूनानी चिकित्सा का अभ्यास करते थे। उनकी हवेली केवल निवास स्थान ही नहीं, बल्कि एक चिकित्सा केंद्र भी थी, जहां लोग इलाज के लिए आते थे।

    इनके अतिरिक्त 17वीं और 18वीं शताब्दी में अमीर व्यापारियों और नवाबों ने बल्लिमारान और चांदनी चौक इलाकों में कई हवेलियाँ बनवाईं।

    इनमें से कुछ अभी भी संरक्षित हैं, जबकि कुछ का पुनर्निर्माण कर दिया गया है

    हवेलियों का स्थापत्य और विशेषताएं

    ये हवेलियाँ प्राचीन मुगल और राजपूत शैली के मिश्रण से बनी हैं।बड़ी-बड़ी जालियाँ, नक्काशीदार दरवाजे, आंगन और फव्वारे इनकी प्रमुख विशेषताएं हैं। कुछ हवेलियों में भित्ति चित्र और हाथ से बनी कारीगरी भी देखी जा सकती है।

    आधुनिक समय में स्थिति

    आज इनमें से कई हवेलियां जर्जर अवस्था में हैं, जबकि कुछ को हेरिटेज साइट के रूप में पुनः संरक्षित किया गया है। मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली और बेगम समरू की हवेली को ऐतिहासिक धरोहर के रूप में देखा जाता है।

    दिल्ली की ये हवेलियां न केवल ऐतिहासिक गवाह हैं, बल्कि यह भी दिखाती हैं कि पुरानी दिल्ली कभी कितनी समृद्ध और भव्य थी।

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