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    Famous Siddha Devi Temple: एक ऐसा सिद्ध देवी मंदिर जहां प्राचीन काल से मौजूद एक पवित्र पत्थर को छूने भर से होती है मुराद पूरी, तांत्रिक अनुष्ठानों का केंद्र है ये स्थल

    Janta YojanaBy Janta YojanaApril 3, 2025No Comments7 Mins Read
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    West Bengal Famous Siddha Devi Tarapith Temple

    West Bengal Famous Siddha Devi Tarapith Temple

    West Bengal Tarapith Temple: सनातन संस्कृति का विराट रूप देखना हो तो हमें 51 शक्तिपीठों की यात्रा जरूर करनी चाहिए। जहां आस्था और अध्यात्म के अनोखे संगम के बीच चमत्कार और रहस्यों से जुड़े अनगिनत किस्से प्रचलित हैं। इसी कड़ी में पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित तारापीठ मंदिर का भी नाम प्रमुखता से शामिल है। यह हिंदू धर्म के 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि तांत्रिक साधना और रहस्यमई किस्सों के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां देवी सती की तीसरी आंख गिरने का उल्लेख मिलता है, जो इस स्थान को और भी पवित्र बनाता है। खासकर नवरात्र के दौरान भक्तों के विशाल हुजूम के बीच जगह-जगह तांत्रिक अनुष्ठानों से स्थल और अधिक दिव्यता प्रदान करता हुआ नजर आता है। इस मंदिर में मौजूद एक काला पत्थर यहां आने वाले लोगों के बीच खास महत्व रखता है। आइए जानते हैं तारापीठ मंदिर के महत्व, इतिहास, तांत्रिक प्रथाओं और इससे जुड़े विभिन्न रहस्यों और किंवदंतियों के बारे में विस्तार से :-

    तारापीठ मंदिर का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

    तारापीठ मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है, जिसे भारतीय धार्मिक मान्यता में अत्यधिक पवित्र माना जाता है। हिन्दू धर्म के अनुसार, जब भगवान शिव अपनी पत्नी देवी सती की मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर पूरी सृष्टि में घूम रहे थे, तो सती के शरीर के विभिन्न अंग पृथ्वी पर गिर गए। इन स्थानों को शक्तिपीठ कहा गया और तारापीठ उन 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहाँ देवी सती की तीसरी आंख गिरी थी।

    यह स्थान शक्तिशाली देवी तारा के मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। तारा देवी का मंदिर विशेष रूप से तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध है और यहां श्रद्धालुओं का विश्वास है कि देवी तारा उनकी सभी इच्छाओं को पूर्ण करती हैं। इस मंदिर की पवित्रता और धार्मिक महत्व श्रद्धालुओं के लिए अत्यधिक आकर्षण का केंद्र है।

    तारापीठ मंदिर के अन्य नाम और प्रतिष्ठा

    तारापीठ मंदिर को आमतौर पर मां तारा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। तारा देवी की उपासना तंत्र साधना के माध्यम से की जाती है, जो विशेष रूप से उन भक्तों के लिए होती है जो शक्ति प्राप्ति, मानसिक शांति और जीवन के कठिन पहलुओं से निपटने के लिए देवी तारा की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं।

    मंदिर के आसपास का वातावरण एक विशेष आध्यात्मिक शक्ति से भरा हुआ है, जो भक्तों को आकर्षित करता है और उन्हें मानसिक शांति और दिव्य अनुभव की प्राप्ति होती है।

    तांत्रिक प्रथाओं का केंद्र

    तारापीठ मंदिर तांत्रिक साधना के लिए प्रसिद्ध है। यहां पर विशेष रूप से तांत्रिक साधनाएं और अनुष्ठान किए जाते हैं। तंत्र विद्या के अनुयायी इस मंदिर को एक महत्वपूर्ण केंद्र मानते हैं, जहां वे अपनी साधना और योग की प्रक्रिया को पूरा करते हैं। खासकर नवरात्रि के दौरान यहां तांत्रिक अनुष्ठान और पूजा आयोजित की जाती है, जिसमें शक्ति की प्राप्ति के लिए विभिन्न मंत्रों का उच्चारण और अनुष्ठान किए जाते हैं।

    तांत्रिक साधक, जो इस स्थान को विशेष रूप से अपनी साधना के लिए चुनते हैं, मानते हैं कि यहां देवी तारा की शक्ति अत्यधिक सशक्त है और वे अपनी इच्छाओं को पूरा करने में सक्षम होते हैं। इस स्थान पर तंत्र के रहस्यमय और शक्तिशाली पहलुओं का अनुभव किया जा सकता है, जो भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।

    वशिष्ठ मुनि से भी जुड़ा मंदिर का नाता

    तारापीठ मंदिर के इतिहास में वशिष्ठ मुनि का भी महत्वपूर्ण योगदान है। प्राचीन काल में वशिष्ठ मुनि ने यहां तपस्या की थी और यह स्थान उनके तपोभूमि के रूप में प्रसिद्ध था। बाद में, इस स्थान को एक शक्तिपीठ के रूप में विकसित किया गया और देवी तारा की पूजा की परंपरा यहाँ स्थापित हुई। वशिष्ठ मुनि का इस स्थल से जुड़ा होना इस मंदिर के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व को और भी बढ़ाता है।

    तारापीठ से जुड़े रहस्य और किंवदंतियां

    तारापीठ मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह एक रहस्यमय स्थान भी है, जहां से जुड़े कई किस्से और किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। इनमें से कुछ प्रमुख रहस्य और किस्से निम्नलिखित हैं:-

    तारापीठ मंदिर की विशेषता

    मंदिर में श्रद्धालुओं का कहना है कि जब वे सच्चे दिल से पूजा करते हैं, तो उनकी सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं और वे जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं। यह मंदिर विशेष रूप से उन भक्तों के लिए है, जो कठिनाईयों का सामना कर रहे होते हैं।

    काला पत्थर और जल

    मंदिर के समीप एक काले पत्थर को लेकर यह मान्यता है कि यह पत्थर देवी तारा की आंख का प्रतीक है। इसके बारे में कहा जाता है कि इस पत्थर को छूने से भक्तों की सभी बाधाएं और अड़चने दूर होती हैं और वे सफलता प्राप्त करते हैं। यह भी मान्यता है कि इस पवित्र पत्थर पर चढ़ाए जाने वाले जल को ग्रहण करने से तमाम तरह की परेशानियों से मुक्ति मिलती है।

    देवी काली और देवी तारा दोनों में ये होता है अंतर

    देवी काली और देवी तारा दोनों ही हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण देवियां हैं और देखने में दोनों ही लगभग एक समान प्रतीत होती हैं। दोनों की पूजा का उद्देश्य भी अलग-अलग होता है, साथ ही उनकी रूप रचनाएं और प्रतीकात्मकता में काफी कुछ असमानताएं हैं। जो कि इस प्रकार हैं –

    1. रंग:

    देवी काली का रंग काला होता है, जो अंधकार, विनाश और शक्ति का प्रतीक है। काली को अक्सर काल, मृत्यु और समय की देवी के रूप में पूजा जाता है।

    देवी तारा का रंग नीला बताया जाता है, जो शांति, सुरक्षा और दिव्य ऊर्जा का प्रतीक है।

    2. रूप और स्थान:

    देवी काली को अक्सर महादेव शिव के साथ जुड़ा हुआ दिखाया जाता है, जिसमें वह शिव की छाती पर पैर रखकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। काली का रूप विनाशक होता है और वह अपने भक्तों को पाप से मुक्ति देने के लिए जानी जाती हैं।

    देवी तारा शव के ऊपर स्थित मानी जाती हैं और वह विशेष रूप से एक देवता के रूप में जीवन और मृत्यु के चक्र को पार करने वाली देवी के रूप में पूजा जाती हैं।

    3. हथियार और प्रतीक:

    देवी काली के हाथ में तलवार, त्रिशूल और अन्य हथियार होते हैं, जो उनके युद्ध और विनाश की शक्ति का प्रतीक हैं।

    देवी तारा के हाथ में कैंची होती है, जो उनके द्वारा जीवन के बंधनों को काटने और मुक्त करने की क्षमता का प्रतीक है।

    4. पूजा का उद्देश्य:

    देवी काली की पूजा मुख्य रूप से पाप नष्ट करने, आत्मा को शुद्ध करने और बुराई पर अच्छाई की विजय पाने के लिए की जाती है।

    देवी तारा की पूजा मुख्य रूप से बाधाओं को दूर करने, संकटों से उबारने और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने के लिए की जाती है। इस प्रकार, देवी काली और देवी तारा दोनों के अलग-अलग रूप, उद्देश्य और शक्तियां हैं। लेकिन दोनों ही शक्तिशाली और दिव्य देवियां मानी जाती हैं।

    प्रमुख उत्सव और अनुष्ठान

    तारापीठ मंदिर में प्रमुख धार्मिक उत्सव नवरात्रि, माघ मास की दुर्गा पूजा और तांत्रिक अनुष्ठान होते हैं। इन अवसरों पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। खासकर नवरात्रि के दौरान यहां विशेष पूजा आयोजित की जाती है, जिसमें देवी तारा के विभिन्न रूपों की पूजा होती है। तांत्रिक साधकों के लिए यह समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह साधना का सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। इस दौरान विशेष तंत्र साधनाएं और हवन किए जाते हैं, जो श्रद्धालुओं के जीवन में शांति और समृद्धि लाते हैं।

    यात्रा और दर्शन

    तारापीठ मंदिर पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन बोलपुर है, जो मंदिर से करीब 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां से टैक्सी या बस द्वारा मंदिर आसानी से पहुंचा जा सकता है। इसके अलावा, कोलकाता से भी यहां आने के लिए विभिन्न परिवहन सुविधाएं उपलब्ध हैं। तारापीठ मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह तांत्रिक साधना और रहस्यमयी किंवदंतियों का केंद्र भी है। यहां देवी तारा की उपासना से श्रद्धालुओं को आशीर्वाद और शक्ति प्राप्त होती है। इस मंदिर का महत्व न केवल भारत में, बल्कि दुनियाभर में फैला हुआ है। यह एक ऐसा स्थान है जहां आस्था, तंत्र और रहस्य का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है। तारापीठ मंदिर की यात्रा किसी भी श्रद्धालु के लिए एक अद्वितीय और दिव्य अनुभव होती है।

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