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    Home » Namak Haram Ki Haveli: गद्दारी की निशानी नमक हराम की हवेली एक ऐतिहासिक धरोहर
    Tourism

    Namak Haram Ki Haveli: गद्दारी की निशानी नमक हराम की हवेली एक ऐतिहासिक धरोहर

    By March 4, 2025No Comments6 Mins Read
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    Namak Haram Ki Haveli (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    Namak Haram Ki Haveli (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    Namak Haram Ki Haveli: भारत के इतिहास में कई ऐसे स्थल हैं जो शौर्य, बलिदान और संघर्ष की कहानियाँ समेटे हुए हैं, वहीं कुछ ऐसे भी स्थान हैं जो विश्वासघात और गद्दारी के कारण प्रसिद्ध हुए। दिल्ली के चांदनी चौक स्थित ‘नमक हराम की हवेली’ (Namak Haram Ki Haveli) ऐसी ही एक इमारत है, जिसका नाम सुनते ही लोगों को एक गद्दार की कहानी याद आ जाती है। यह हवेली 19वीं सदी की शुरुआत में एक ऐसे व्यक्ति के कारण कुख्यात हुई, जिसने अपने स्वामी से विश्वासघात कर अंग्रेजों का साथ दिया। इस लेख में हम इस हवेली का ऐतिहासिक महत्व, वर्तमान स्थिति और उससे जुड़ी दिलचस्प कहानियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

    ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मराठाओं और अंग्रेजों का संघर्ष

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी की शुरुआत में भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा था। कई भारतीय रियासतें धीरे-धीरे अंग्रेजों के अधीन हो रही थीं, लेकिन कुछ योद्धा अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। ऐसे ही एक शासक थे महाराजा यशवंतराव होलकर (Maharaja Yashwantrao Holkar), जिन्होंने अंग्रेजों के बढ़ते प्रभुत्व को रोकने के लिए युद्ध किया।

    भवानी शंकर खत्री: गद्दारी की शुरुआत

    भवानी शंकर खत्री नामक एक व्यक्ति यशवंतराव होलकर का विश्वसनीय सहयोगी था। वह मराठा सेना की कई अहम योजनाओं और रणनीतियों से परिचित था। लेकिन समय के साथ खत्री ने अंग्रेजों से गुप्त संबंध बना लिए और उनकी सेना को महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी देना शुरू कर दिया।

    पटपड़गंज का युद्ध और विश्वासघात

    1803 में पटपड़गंज की लड़ाई (Battle of Patparganj) में मराठा सेना और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में भवानी शंकर खत्री ने अंग्रेजों की मदद की और मराठा सेना की रणनीति और कमजोरियों की जानकारी उन्हें दे दी। इसके परिणामस्वरूप महाराजा यशवंतराव होलकर की सेना को पराजय का सामना करना पड़ा।

    अंग्रेज इस गद्दारी से प्रसन्न हुए और उन्होंने भवानी शंकर खत्री को इनामस्वरूप चांदनी चौक में एक शानदार हवेली प्रदान की। लेकिन जनता ने इसे एक ‘गद्दार की हवेली’ के रूप में देखना शुरू कर दिया और जल्द ही यह ‘नमक हराम की हवेली’ के नाम से कुख्यात हो गई।

    हवेली का नाम ‘नमक हराम की हवेली’ क्यों पड़ा?

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    जिस व्यक्ति को यह हवेली मिली थी, उसने अपने स्वामी के साथ विश्वासघात किया था। भारतीय समाज में गद्दारी को बहुत बड़ा अपराध माना जाता है, इसलिए लोग इस हवेली को हेय दृष्टि से देखने लगे।

    इस हवेली को ‘नमक हराम की हवेली’ नाम इसलिए मिला क्योंकि:

    -नमक हराम (विश्वासघाती) वह व्यक्ति था, जिसने अपने स्वामी से गद्दारी की।

    -यह हवेली उसे अंग्रेजों द्वारा इनाम में दी गई थी, जो उसकी गद्दारी का प्रमाण थी।

    -स्थानीय लोगों ने इसे हमेशा नकारात्मक दृष्टि से देखा और आज तक इसे इसी नाम से पुकारा जाता है।

    -समय के साथ, यह हवेली इतिहास का हिस्सा बन गई और इसके नाम के पीछे की कहानी लोगों की स्मृतियों में बसी रही।

    हवेली की वास्तुकला और संरचना

    ‘नमक हराम की हवेली’ दिल्ली के चांदनी चौक के कूचा घसीराम गली में स्थित है। यह एक पारंपरिक मुगल और राजपूत शैली की हवेली है, जो उस समय की शाही वास्तुकला को दर्शाती है।

    हवेली की प्रमुख विशेषताएँ:

    बड़े प्रवेश द्वार– लकड़ी के नक्काशीदार दरवाजे, जो अब जर्जर स्थिति में हैं।

    खूबसूरत झरोखे– राजस्थान और मुगल वास्तुकला से प्रेरित बालकनी और झरोखे।

    आलीशान आंगन– पहले यहाँ बड़े उत्सव और आयोजन होते थे।

    संगमरमर के खंभे और मेहराब– हवेली के आंतरिक हिस्सों में सुंदर नक्काशी थी, जो अब क्षतिग्रस्त हो चुकी है।

    हालांकि, अब यह हवेली खंडहर में तब्दील हो चुकी है और इसकी भव्यता केवल कल्पना में ही देखी जा सकती है।

    हवेली की वर्तमान स्थिति

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    आज, ‘नमक हराम की हवेली’ एक उपेक्षित और जर्जर इमारत बन चुकी है। यह हवेली अब कई छोटे किरायेदारों और स्थानीय लोगों का ठिकाना बन गई है, जो नाममात्र के किराए पर यहाँ रह रहे हैं।

    वर्तमान स्थिति:

    बहुत से हिस्से गिर चुके हैं – हवेली के कई आंतरिक भाग ढह चुके हैं और इसकी हालत काफी दयनीय हो चुकी है।

    किराएदारों का बसेरा – हवेली में रहने वाले किराएदारों में से कुछ पिछले कई दशकों से यहाँ रह रहे हैं। वे मात्र 5 से 10 रुपये प्रति माह के पुराने किराए पर यहाँ रहते हैं।

    अतिक्रमण और अव्यवस्था – हवेली में अवैध कब्जे की भी समस्या है। इसके आसपास के इलाके में कई छोटी दुकानें और गोदाम बन चुके हैं।

    सरकारी उपेक्षा – यह ऐतिहासिक स्थल होते हुए भी सरकारी विभागों ने इसके संरक्षण की कोई पहल नहीं की है।

    आज यह हवेली दिल्ली के चहल-पहल वाले बाजार में एक गुमनाम धरोहर बनकर रह गई है।

    क्या इस हवेली को संरक्षित किया जा सकता है?

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    ‘नमक हराम की हवेली’ भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इसकी वर्तमान स्थिति दयनीय है। इसे एक संरक्षित स्मारक के रूप में विकसित किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे:

    सरकारी संरक्षण – भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को इस ऐतिहासिक इमारत के संरक्षण के लिए पहल करनी चाहिए।

    हेरिटेज वॉक और टूरिज्म – इसे दिल्ली के हेरिटेज वॉक का हिस्सा बनाया जा सकता है, जिससे लोग इसके इतिहास से परिचित हो सकें।

    स्थानीय जागरूकता अभियान – स्थानीय लोगों और इतिहासकारों को इस हवेली के संरक्षण के लिए प्रयास करना चाहिए।

    नवीनीकरण और मरम्मत – इसकी वास्तुकला को संरक्षित करने के लिए उचित मरम्मत और बहाली की जरूरत है।

    अगर उचित प्रयास किए जाएँ, तो यह हवेली भविष्य में पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकती है।

    चांदनी चौक में स्थित इस ऐतिहासिक हवेली में आज भी कई परिवार बसे हुए हैं, जो पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि यहां रहने वालों को अब भी बेहद नाममात्र का किराया चुकाना पड़ता है, जो केवल पांच से दस रुपये तक है। कहा जाता है कि इस हवेली के मूल मालिक द्वारा करीब 200 साल पहले किए गए विश्वासघात के धब्बे अब तक इस इमारत से नहीं मिट सके हैं।

    एक सबक भरी दास्तान

    ‘नमक हराम की हवेली’ केवल एक इमारत नहीं, बल्कि विश्वासघात और स्वार्थ की काली छाया का प्रतीक है। यह भारत के इतिहास की उन घटनाओं में से एक है, जो हमें सिखाती है कि गद्दारी की सजा समय के साथ भी नहीं मिटती। भवानी शंकर खत्री की इस हवेली को आज भी लोग नकारात्मक दृष्टि से देखते हैं और इसका नाम भारतीय समाज में गद्दारी के उदाहरण के रूप में लिया जाता है।

    हालांकि, अब यह हवेली इतिहास में दबी एक भूली-बिसरी निशानी बनकर रह गई है, लेकिन इसके खंडहर आज भी एक कहानी कहते हैं – “विश्वासघात का परिणाम हमेशा बुरा ही होता है।”

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