
Ketheeswaram Temple History: श्रीलंका एक ऐसा देश है जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ – साथ वहां मैजूद प्राचीन मंदिरो के लिए भी जाना जाता है । इसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण मंदिर है केतिश्वरम , जिसे थिरुक्केतिश्वरम के नाम से भी जाना जाता है ।केतिश्वरम मंदिर श्रीलंका के मन्नार जिले में स्थित एक पुरातन शिव मंदिर है । यह मंदिर श्रीलंका में स्थित पञ्च ईश्वरम (Pancha Ishwarams) में से एक है जो भगवान शिव को समर्पित पांच प्रमुख तटीय मंदिरों का समूह प्राचीन तमिल साहित्य में उल्लेखित इस मंदिर को तमिल संस्कृति और हिंदू धर्म के इतिहास का अनमोल रत्न माना जाता है। केतिश्वरम मंदिर धार्मिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक दृष्टी से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
केतिश्वरम मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

केतिश्वरम मंदिर के निर्माण को लेकर मतभेद देखने को मिलते है। लेकिन इतिहासकार पॉल ई. पीरिस के अनुसार यह मंदिर 600 ईसा पूर्व ही अस्तित्व में था।इस मंदिर का इतिहास लगभग 2400 वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है। मंदिर मन्नार जिले के मंथोट्टम (मंटोताई/मंथाई) के नज़दीक स्थित है जो प्राचीन तमिल व्यापारिक बंदरगाह था। यह बंदरगाह और मंदिर दोनों का प्राचीन अस्तित्व संगम साहित्य और अन्य पुरातात्विक अवशेष से प्रमाणित है। मंथोट्टम का उल्लेख उस युग के तमिल साहित्य में ‘सबसे महान बंदरगाहों में से एक’ के रूप में मिलता है जहां आज भी पुरातन स्थल के अवशेष मौजूद हैं। इसके अलावा क्षेत्र की मूल निवासी करैया नागा जनजाति एवं करैयार समुदाय द्वारा शुरूआती निर्माण का उल्लेख भी मिलता है।
केतिश्वरम को श्रीलंका के पांच प्राचीन शिव मंदिरों (पंच ईश्वरम) में से एक माना जाता है। छठी से नौवीं शताब्दी में इस मंदिर का विवरण तमिल शैव साहित्य तेवरम में मिलता है । जिसकारण यह मंदिर, महाद्वीप के 275 पाडल पेट्रा स्थलों में से एक है। 275 पाडल पेट्रा शिव के सबसे पवित्र स्थलों की सूची है। मध्ययुगीन काल में जब पल्लव, पांड्य और चोल जैसे दक्षिण भारतीय राजवंश सत्ता में थे, तब उन्होंने केतिश्वरम मंदिर के रखरखाव, मरम्मत, विस्तार या धार्मिक गतिविधियों से संबंधित लिखित प्रमाण (जैसे शिलालेख, ताम्रपत्र या दस्तावेज) छोड़े है ।
16वीं शताब्दी में पुर्तगालियों ने इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था और इसके पत्थरों का उपयोग स्थानीय किलों और चर्चों में किया था । जिसके बाद लगभग 400 वर्षों के अंतराल के बाद 1910 के दशक में हिंदू सुधारक अरुमुका नवलार के नेतृत्व में स्थानीय तमिल समुदाय की मदत से केतिश्वरम मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया । बाद में 1948, 1952 और 1976 में मंदिर के पुनरुद्धार और अभिषेक भी किया गया ।
इसके अलावा 1983 के बाद के गृहयुद्ध के दौरान मंदिर और उसके आस-पास के क्षेत्र पर श्रीलंकाई सेना का कब्जा था हालाँकि वे अब मंदिर परिसर से हट चुके हैं, पर उनका परिसर पर कब्जा प्रशासनिक रूप से चिंता का विषय बना हुआ है। वर्त्तमान समय में यह मंदिर हिंदू श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है।
मंदिर से जुडी दंतकथाएं
लोककथाओं और रामायण से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, केतिश्वरम मंदिर रावण की पत्नी मंदोदरी मंथई से संबंधित है। मंदोथरी के पिता और मंथई के राजा मय ने शिव की पूजा करने के उद्देश्य से इस प्राचीन मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके अलावा विभिन्न कथाओं में यह भी कहा गया है कि महर्षि भृगु और ग्रह देवता केतु ने यहां शिव की पूजा की और इसी कारण इसे ‘केतिश्वरम’ कहा जाने लगा।
स्कंद पुराण में भी मंदिर का उल्लेख है, जिसमें यह वर्णन मिलता है कि पवन देव (वायु) ने पर्वत महामेरु की तीन मीनारों में से एक को यहां स्थापित किया और भगवान शिव ने स्वयं को यहां विराजमान किया। तमिल ग्रंथ मनमियम के अनुसार, तिरुकेतीश्वरम और कोनेश्वरम मंदिर हिंदुओं के नौ सबसे पवित्र स्थलों में से हैं जिनमें से बाकी सात भारत में स्थित हैं। इस तरह मंदिर की स्थापना और पौराणिक कथाएं इसे श्रीलंका के सबसे प्रतिष्ठित शिव स्थलों में एक विशेष स्थान प्रदान करती हैं।
केतिश्वरम मंदिर का धार्मिक महत्त्व

केतिश्वरम मंदिर का नाम ‘ईश्वरम’ संबंधित है जिसका अर्थ ‘ईश्वर का स्थान’ या ‘भगवान का निवास’ है। यह मंदिर श्रीलंका के पंच ईश्वरम (शिव के लिए समर्पित पाँच प्राचीन मंदिरों) में से एक है जहां पूजा विधियाँ मुख्य रूप से पारंपरिक शैव आगम मान्यताओं के आधार पर की जाती है । अन्य चार पंच ईश्वरम मंदिरों में मुननेस्वरम, कंचीस्वरम, नागूलश्वरम और तोंडेश्वरम इनका समावेश है। हर वर्ष चेत्र, वैशाख, सावन और महाशिवरात्रि के अवसर पर हजारों श्रद्धालु मंदिर में पूजा – अर्चना करने यहाँ आते हैं। मंदिर का पवित्र जल क्षेत्र ‘पार्वती तीर्थ’ यहां की धार्मिक पूजन का केंद्रीय स्थल है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती के निर्देश पर भगवान शिव यहाँ ‘केतिश्वर’ रूप में विराजमान हुए थे। केतिश्वरम का उल्लेख तमिल संतों की रचनाओं विशेषकर ‘संगम’ कविता और ‘द्यविश्वर पाठ’ (शैव भक्ति साहित्य) में मिलता है ।
केतिश्वरम मंदिर का वास्तुशिल्प

केतिश्वरम मंदिर दक्षिण भारतीय द्रविड़ शैली का अद्भुत उदाहरण है। मंदिर का नवनिर्माण 1903 में तमिलनाडु के नट्टुकोट्टई नागरथार समुदाय द्वारा किया गया था, जिन्होंने इसकी बनावट कोमजबूत व विकसित किया।
• गोपुरम (मुख्य द्वार) – गोपुरम मंदिर केतिश्वरम मंदिर का भव्य प्रवेश द्वार है, जिसे रंगीन मूर्तियों और आभूषणो से सजाया गया है।
• मंडप – मंदिर परिसर में कई मंडप हैं जिनमें पूजा, धार्मिक अनुष्ठान एवं सामाजिक समारोह किए जाते हैं।
• गर्भगृह – यहाँ भगवान शिव की प्रतिमा ‘केतिश्वर’ के रूप में विराजमान है। शिवलिंग के चारों ओर आकृति-संपन्न परिक्रमा पथ है।
• शिल्पकला – मंदिर की दीवारों, स्तंभों और छतों पर सुंदर कारीगरी की गई है। जिसमें देवी-देवताओं, विविध पौराणिक दृश्यों और तमिल संस्कृति के चित्र उकेरे गए हैं।
केतिश्वरम मंदिर का सांस्कृतिक महत्त्व
केतिश्वरम मंदिर श्रीलंका के तमिल समुदाय के लिए सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। यह मंदिर भाषा, कला और संगीत समेत तमिल संस्कृति के संरक्षण का केंद्र माना जाता है, जहाँ नियमित रूप से परंपरागत तमिल सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। मंदिर परिसर में पारंपरिक दक्षिण भारतीय संगीत, भजन और नृत्य महोत्सव आयोजित किए जाते हैं । इसके अतिरिक्त केतिश्वरम मंदिर में विवाह, उपनयन संस्कार और अन्य सामाजिक एवं धार्मिक समारोह भी संपन्न किए जाते है जो स्थानीय तमिल समुदाय के सामाजिक जीवन में इस मंदिर की अहमियत को दर्शाते हैं। इस प्रकार, केतिश्वरम मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ तमिल सामाजिक- सांस्कृतिक जीवन का सजीव प्रमाण भी है।
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