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    Home » नैमिषारण्य: पौराणिक महिमा, ऐतिहासिक संदर्भ और प्रमुख तीर्थों का विस्तृत परिचय
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    नैमिषारण्य: पौराणिक महिमा, ऐतिहासिक संदर्भ और प्रमुख तीर्थों का विस्तृत परिचय

    Janta YojanaBy Janta YojanaFebruary 21, 2026No Comments5 Mins Read
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    Naimisharanya History (Image Credit-Social Media)

    Naimisharanya History

    Naimisharanya: नैमिषारण्य हिन्दुओं का एक अत्यंत प्राचीन और प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। यह उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में गोमती नदी के तट पर स्थित है। लखनऊ से इसकी दूरी लगभग 90 किलोमीटर है। नैमिषारण्य का निकटतम रेलवे स्टेशन ‘नैमिषारण्य’ (नीमसार) है, जबकि सीतापुर जंक्शन यहाँ से लगभग 35–40 किलोमीटर दूर स्थित है।

    नैमिषारण्य को ‘नीमसार’ के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों, विशेषकर ‘महाभारत’, ‘विष्णु पुराण’, ‘भागवत पुराण’ और ‘स्कन्द पुराण’ में इस तीर्थ का विस्तृत उल्लेख मिलता है। इसे भारत के प्रमुख वैष्णव और वैदिक तीर्थों में गिना जाता है।

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    पौराणिक उत्पत्ति और ‘नैमिष’ नाम की कथा

    पौराणिक मान्यता के अनुसार, महर्षि शौनक ने दीर्घकालीन ‘ज्ञानसत्र’ (महायज्ञ) आयोजित करने का संकल्प लिया। उन्होंने भगवान विष्णु की आराधना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें एक दिव्य चक्र प्रदान किया और कहा कि जिस स्थान पर इस चक्र की ‘नेमि’ (परिधि) गिर जाए, वही स्थान यज्ञ और तप के लिए सर्वोत्तम होगा।

    महर्षि शौनक और उनके साथ अस्सी हजार (88,000) ऋषि उस चक्र के पीछे-पीछे चले। गोमती नदी के तट पर एक घने वन क्षेत्र में चक्र की नेमि गिर गई और वह चक्र भूमि में समा गया। इसी कारण उस स्थान का नाम ‘नैमिष’ पड़ा, और वन क्षेत्र होने के कारण वह ‘नैमिषारण्य’ कहलाया।

    ‘नैमिष’ शब्द संस्कृत के ‘निमिष’ से भी जुड़ा माना जाता है, जिसका अर्थ है ‘क्षण’। कुछ ग्रंथों में उल्लेख है कि यहाँ एक निमिष मात्र में असुरों का संहार हुआ था, इसलिए भी यह क्षेत्र ‘नैमिष’ कहलाया।

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    चक्रतीर्थ: नैमिषारण्य का हृदय

    नैमिषारण्य का सबसे प्रमुख स्थल ‘चक्रतीर्थ’ है। यह एक गोलाकार सरोवर है, जिसके मध्य भाग से निरंतर जल प्रवाहित होता रहता है। मान्यता है कि यही वह स्थान है जहाँ भगवान विष्णु का चक्र भूमि में समा गया था। श्रद्धालु यहाँ स्नान कर पुण्य प्राप्ति की कामना करते हैं।

    चक्रतीर्थ का वर्तमान स्वरूप पक्का घाटों और परिक्रमा पथ से युक्त है, और इसे नैमिषारण्य का आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है।

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    84 कोस परिक्रमा की परंपरा

    नैमिषारण्य की परिक्रमा 84 कोस की मानी जाती है। यह परिक्रमा परंपरागत रूप से फाल्गुन अमावस्या से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक संपन्न होती है। हजारों श्रद्धालु इस अवधि में परिक्रमा कर धार्मिक पुण्य अर्जित करते हैं।

    इसके अतिरिक्त ‘अंतर्वेदी’ नामक छोटी परिक्रमा भी प्रचलित है, जिसमें मुख्य तीर्थों का भ्रमण किया जाता है।

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    नैमिषारण्य के प्रमुख तीर्थ और मंदिर

    1. पंचप्रयाग सरोवर

    यह एक पक्का सरोवर है। इसके समीप ‘अक्षयवट’ नामक प्राचीन वटवृक्ष स्थित है। मान्यता है कि इस वृक्ष के दर्शन और पूजन से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

    2. ललिता देवी मंदिर

    यह नैमिषारण्य का प्रमुख शक्तिपीठ माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का ‘हृदय’ भाग गिरा था, इसलिए यह 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।

    मंदिर परिसर में गोवर्धन महादेव, क्षेमकाया देवी, जानकी कुंड, हनुमान मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, धर्मराज मंदिर और विश्वनाथजी के मंदिर भी स्थित हैं। यहाँ पिंडदान और श्राद्ध कर्म भी संपन्न किए जाते हैं।

    3. व्यास गद्दी और शुकदेव स्थान

    यहाँ एक मंदिर के भीतर शुकदेवजी की मूर्ति स्थापित है और बाहर व्यास गद्दी स्थित है। मान्यता है कि यहीं महर्षि वेदव्यास ने पुराणों का उपदेश दिया था और सूतजी ने ऋषियों को कथा सुनाई थी।

    पास में मनु और शतरूपा के चबूतरे भी बने हुए हैं, जिन्हें उनकी तपोभूमि माना जाता है।

    4. दशाश्वमेध टीला

    यह एक ऊँचा टीला है जहाँ एक मंदिर में श्रीकृष्ण और पाण्डवों की मूर्तियाँ स्थापित हैं। नाम से संकेत मिलता है कि यहाँ प्राचीन काल में अश्वमेध यज्ञ हुआ होगा, यद्यपि इसका ऐतिहासिक प्रमाण सीमित है।

    5. पाण्डव किला

    यह एक टीले पर स्थित संरचना है, जहाँ श्रीकृष्ण और पाण्डवों की मूर्तियाँ हैं। इसे महाभारत काल से जोड़कर देखा जाता है, परंतु वर्तमान संरचनाएँ अपेक्षाकृत बाद के काल की मानी जाती हैं।

    6. सूतजी का स्थान

    एक मंदिर में सूतजी की गद्दी स्थापित है। मान्यता है कि यहीं उन्होंने 88,000 ऋषियों को पुराणों की कथा सुनाई थी। यहाँ राधा-कृष्ण और बलरामजी की मूर्तियाँ भी विराजमान हैं।

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    आश्रम परंपरा

    नैमिषारण्य में विभिन्न संतों और महात्माओं के आश्रम स्थित हैं। यहाँ परंपरागत गुरुकुल पद्धति से शिक्षा देने वाले ब्रह्मचर्य आश्रम भी संचालित होते रहे हैं। साधक यहाँ ध्यान, जप और तपस्या के लिए निवास करते हैं।

    लोकमान्यता है कि कलियुग में सभी तीर्थ नैमिष क्षेत्र में आकर निवास करते हैं, इसलिए इसे विशेष रूप से पुण्यदायक माना गया है।

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    ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

    नैमिषारण्य केवल पौराणिक कथा का स्थल नहीं, बल्कि भारतीय वैदिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। अनेक पुराणों की रचना और कथन का स्थल होने के कारण इसे ‘पुराणों की जन्मभूमि’ भी कहा जाता है।

    पुरातात्त्विक दृष्टि से यहाँ प्राचीन बसावट के संकेत मिले हैं, परंतु अधिकांश वर्तमान मंदिर और संरचनाएँ मध्यकाल और आधुनिक काल में निर्मित या पुनर्निर्मित हैं।

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    नैमिषारण्य आज भी श्रद्धा, तप और ज्ञान का संगम है। यदि आप उत्तर प्रदेश की यात्रा करें तो इस पावन धाम के दर्शन अवश्य करें।

    (साभार: स्कन्द पुराण, विष्णु पुराण, भागवत पुराण, उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग)

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