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    Home » Japan Generation History: जापान की एक ऐसी पीढ़ी जो महीनों तक नहीं निकलती घर से बाहर, जानिए पूरी कहानी
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    Japan Generation History: जापान की एक ऐसी पीढ़ी जो महीनों तक नहीं निकलती घर से बाहर, जानिए पूरी कहानी

    Janta YojanaBy Janta YojanaJuly 20, 2025No Comments10 Mins Read
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    Japan Hikikomori Generation History

    Japan Hikikomori Generation History

    Japan Hikikomori Generation History: जापान जिसकी पहचान गगनचुंबी इमारतों, अद्भुत तकनीकी विकास और अनुशासित जीवनशैली से होती है। वहां एक अदृश्य लेकिन तेजी से बढ़ता हुआ सामाजिक संकट जन्म ले रहा है ‘हिकिकोमोरी’। यह शब्द उन युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो वर्षों तक खुद को समाज से पूरी तरह काटकर अपने कमरे में कैद कर लेते हैं। वे न नौकरी करते हैं, न पढ़ाई और न ही सामाजिक संबंध रखते हैं। यह केवल मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौती नहीं बल्कि जापान की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, प्रतिस्पर्धा और अकेलेपन से उपजे एक गहरे मानवीय संकट का संकेत है । जो आधुनिक समाज की चकाचौंध में छिपा एक स्याह सच बन चुका है।

    हिकिकोमोरी क्या है?

    ‘हिकिकोमोरी’ एक जापानी शब्द है जिसका अर्थ है ‘स्वेच्छा से सामाजिक जीवन से कट जाना’ और लंबे समय तक अपने कमरे या घर में बंद रहना, बिना किसी सामाजिक संपर्क के। यह स्थिति तब मानी जाती है जब कोई व्यक्ति लगातार छह महीने या उससे अधिक समय तक स्कूल, नौकरी या किसी भी सामाजिक गतिविधि से दूरी बनाए रखता है। यहाँ तक कि दोस्तों और परिवार से भी बातचीत बंद कर देता है। यह केवल शर्मीलेपन या अंतर्मुखी स्वभाव का परिणाम नहीं होता बल्कि यह एक गम्भीर मानसिक और सामाजिक संकट होता है। जो अक्सर अवसाद, चिंता विकार और आत्मसम्मान की समस्याओं से जुड़ा होता है। जापानी समाज में परफेक्शन, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक अपेक्षाओं का अत्यधिक दबाव, साथ ही माता-पिता की अधिक संरक्षणकारी प्रवृत्ति, इस स्थिति को और गहराती है। जापान में लाखों युवा और वयस्क इस संकट का सामना कर रहे हैं जिसे अब एक सामाजिक आपातकाल माना जा रहा है। हालाँकि शुरुआत जापान से हुई, लेकिन आज के समय में हिकिकोमोरी जैसी प्रवृत्ति वैश्विक हो गई है । दक्षिण कोरिया, अमेरिका, इटली और यहाँ तक कि भारत में भी विशेषकर कोविड-19 महामारी के बाद ऐसे मामलों में वृद्धि देखी गई है।

    हिकिकोमोरी के लक्षण

    महीनों या वर्षों तक घर से बाहर न निकलना – हिकिकोमोरी की सबसे स्पष्ट निशानी यही है कि व्यक्ति लंबे समय तक (कम से कम 6 महीने, कभी-कभी वर्षों तक) घर के भीतर ही रहता है और बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटा रहता है।

    परिवार से न्यूनतम बातचीत – हिकिकोमोरी लोग अक्सर अपने ही परिवार के सदस्यों से बहुत कम संवाद करते हैं, कई बार तो बिल्कुल नहीं करते।

    शिक्षा या काम से दूरी – स्कूल, कॉलेज, नौकरी या व्यवसाय से पूरी तरह कट जाना आम बात है। उनमें सामाजिक गतिविधियों की कोई भागीदारी नहीं होती।

    केवल इंटरनेट, गेमिंग, या किताबों के सहारे जीवन – ये लोग अपने समय का अधिकांश हिस्सा अकेले, अक्सर इंटरनेट, वीडियो गेम्स, टीवी या किताबों के साथ बिताते हैं जबकि बाहर की वास्तविक गतिविधियों से दूरी बनाए रखते हैं।

    समाज, समाचार और बाहरी दुनिया से लगभग पूर्ण कटाव – हिकिकोमोरी के व्यक्ति समाज, रिश्तेदारों, पड़ोस, समाचार और समसामयिक घटनाओं से भी दूर हो जाते हैं। कई लोग घर से बाहर निकलना तक बंद कर देते हैं। कभी-कभी तो स्वयं के कमरे तक सीमित हो जाते हैं।

    हिकिकोमोरी की उत्पत्ति और पृष्ठभूमि

    हिकिकोमोरी की समस्या कोई अचानक उभरा हुआ संकट नहीं है बल्कि इसकी जड़ें 1990 के दशक की उस आर्थिक मंदी में हैं जिसे जापान की ‘Lost Decade’ कहा जाता है। इस दौर में आर्थिक बुलबुला फूटने से नौकरियाँ दुर्लभ हो गईं और युवाओं के लिए स्थायी रोजगार की संभावनाएं लगभग खत्म हो गईं। बेरोजगारी, आर्थिक अनिश्चितता और बढ़ते सामाजिक दबाव ने युवा वर्ग के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाला। इसी पृष्ठभूमि में ‘हिकिकोमोरी’ जैसी प्रवृत्तियाँ सामने आने लगीं, जब कई युवाओं ने खुद को सामाजिक जीवन से पूरी तरह काट लिया। जापानी समाज में काम के प्रति अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, कड़ी कार्य संस्कृति (जिसे ‘करोशी’ यानी काम के दबाव से मौत कहा जाता है)और परिवार तथा समाज की अत्यधिक अपेक्षाओं ने युवाओं को भीतर से तोड़ दिया। इतना ही नहीं जापानी संस्कृति में ‘गांव की सोच’ यानी सामूहिक मानसिकता का वर्चस्व है, जहाँ व्यक्ति की पहचान से अधिक समाज और परिवार की छवि को महत्व दिया जाता है। ऐसे में जब कोई व्यक्ति सामाजिक मानकों पर खरा नहीं उतरता। तो वह शर्म और अस्वीकार्यता का शिकार हो जाता है और यही उसे धीरे-धीरे समाज से पूरी तरह अलग कर देता है।

    कौन बनता है हिकिकोमोरी?

    शुरुआती वर्षों में हिकिकोमोरी की समस्या को किशोरों और 20 से 30 वर्ष के युवाओं से जोड़ा गया था। क्योंकि यही वह उम्र होती है जब शिक्षा, करियर और सामाजिक जिम्मेदारियों को लेकर सबसे अधिक दबाव रहता है। लेकिन अब यह प्रवृत्ति उम्रदराज़ लोगों तक पहुँच चुकी है। हाल के वर्षों में जापान में 40 से 50 वर्ष के व्यक्तियों में भी हिकिकोमोरी व्यवहार तेजी से बढ़ा है। जिन्हें ‘Isolated Adults’ या ‘Middle-aged Hikikomori’ कहा जाने लगा है। जापान में इसे ‘8050 समस्या’ के नाम से जाना जाता है । जहां 80 वर्षीय माता-पिता अपने 50 वर्षीय बेरोजगार और समाज से कटी हुई संतान का जीवन भर सहारा बनते हैं। लिंग के लिहाज से देखा जाए तो हिकिकोमोरी के लगभग 70% से अधिक मामले पुरुषों में सामने आते हैं। हालांकि महिलाओं में भी अब यह प्रवृत्ति देखने को मिल रही है लेकिन पारिवारिक भूमिकाओं में सक्रियता के कारण उनका सामाजिक अलगाव अक्सर नज़र नहीं आता या रिपोर्ट नहीं होता। यह स्थिति अधिकतर मध्यम या उच्च-मध्यम वर्गीय परिवारों में देखी जाती है। जहां माता-पिता आर्थिक रूप से इतने सक्षम होते हैं कि वे लंबे समय तक अपने बेटे या बेटी की देखभाल कर सकें। कई बार माता-पिता की सहानुभूति और अत्यधिक संरक्षण व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनने से रोक देती है, जिससे वह समाज से और भी अधिक कट जाता है।

    हिकिकोमोरी बनने के प्रमुख कारण

    शैक्षणिक और सामाजिक दबाव – जापान में शिक्षा प्रणाली अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है। स्कूली छात्रों पर अच्छे ग्रेड लाने, प्रवेश परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने और करियर बनाने का जबरदस्त दबाव होता है। जो छात्र इस दौड़ में पिछड़ते हैं, वे शर्म, असफलता और आत्मग्लानि से भर जाते हैं।

    ‘Shame Culture’ का प्रभाव – जापानी समाज में व्यक्तिगत विफलता को पारिवारिक शर्म के रूप में देखा जाता है। ऐसे में व्यक्ति आत्मसम्मान बचाने के लिए समाज से दूर होना ही बेहतर समझता है।

    साइबर दुनिया का आकर्षण – वीडियो गेम, सोशल मीडिया, ऑनलाइन दुनिया ऐसे युवाओं के लिए एक वैकल्पिक वास्तविकता बन जाती है जहां उन्हें न तो आलोचना का डर होता है और न ही सामाजिक असफलता का सामना करना पड़ता है।

    पारिवारिक लाड़-प्यार और सहनशीलता – अक्सर माता-पिता अपने हिकिकोमोरी बच्चे को अस्वीकार नहीं करते बल्कि उसका हर खर्चा उठाते हैं। इस सहनशीलता से यह स्थिति और भी स्थायी हो जाती है।

    हिकिकोमोरी पीड़ितों की संख्या

    2023 में जापान सरकार द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 15 लाख लोग ऐसे हैं जो लगातार छह महीने या उससे अधिक समय से समाज से पूरी तरह कटे हुए, अपने घरों में सिमटे जीवन जी रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अनरिपोर्टेड यानी छिपे मामलों को भी शामिल किया जाए तो यह संख्या 20 लाख या उससे अधिक हो सकती है। यह समस्या पहले केवल युवाओं तक सीमित मानी जाती थी। लेकिन अब यह तेजी से मिडल एज्ड लोगों, खासकर 40 से 50 वर्ष की उम्र के बीच में भी फैल रही है। सर्वेक्षण में 15 से 64 वर्ष की आयु-सीमा के लोगों को शामिल किया गया, जिसमें पाया गया कि लगभग 70% हिकिकोमोरी पीड़ित पुरुष हैं। जापान में ‘8050 समस्या’ भी एक गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है जिसमें 80 वर्षीय माता-पिता को अपनी 50 वर्षीय हिकिकोमोरी संतान की देखभाल करनी पड़ती है। यह न केवल सामाजिक बल्कि आर्थिक रूप से भी जापान के लिए चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। हिकिकोमोरी से पीड़ित लोगों में अक्सर अवसाद, चिंता और आत्मघाती प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं। लेकिन वे सामाजिक कलंक या भय के कारण सहायता लेने से कतराते हैं जिससे उनका इलाज और पुनर्वास और भी कठिन हो जाता है।

    हिकिकोमोरी की सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ

    हिकिकोमोरी न केवल व्यक्तिगत और पारिवारिक स्तर पर, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी जापान के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। पहले से ही वृद्ध होती जनसंख्या की समस्या से जूझ रहे इस देश के लिए यह प्रवृत्ति कार्यबल में भारी कमी और उत्पादकता में गिरावट का कारण बन रही है। बड़ी संख्या में युवा और वयस्क जब सामाजिक व आर्थिक गतिविधियों से कट जाते हैं। तो इससे न सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है बल्कि सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ता है। हिकिकोमोरी से जुड़ी एक और चिंताजनक स्थिति है ‘8050 समस्या’, जिसमें 80 वर्ष के वृद्ध माता-पिता अपने 50 वर्षीय समाज से कटी हुई संतान की देखभाल करने को मजबूर हैं। जैसे-जैसे दोनों की उम्र बढ़ती है, यह जिम्मेदारी एक असहनीय बोझ में बदल जाती है। मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह स्थिति बेहद संवेदनशील है। हिकिकोमोरी से पीड़ित व्यक्तियों में अवसाद, चिंता विकार और आत्मघाती विचारों की प्रवृत्ति आम होती है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ये लोग अक्सर मदद लेने से कतराते हैं। जिससे न केवल इलाज मुश्किल हो जाता है बल्कि उनका सामाजिक पुनर्वास भी अत्यंत जटिल हो जाता है।

    हिकिकोमोरी से निपटने के प्रयास

    हिकिकोमोरी जैसी गंभीर सामाजिक समस्या से निपटने के लिए जापानी सरकार अब सक्रिय भूमिका निभा रही है। कैबिनेट ऑफिस, स्वास्थ्य, श्रम और कल्याण मंत्रालय (MHLW) तथा स्थानीय प्रशासन ने मिलकर काउंसलिंग सेंटर, पुनर्वास केंद्र, मोबाइल सहायता टीमें और हिकिकोमोरी समर्थन कार्यालय जैसे कई कदम उठाए हैं। वर्ष 2020 से सरकार ने इस समस्या की व्यापकता को समझने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जनगणना भी शुरू की। इसके साथ ही समाज में भी सकारात्मक पहल देखने को मिल रही है। ‘Renouncing Isolation’ जैसे कार्यक्रमों के अंतर्गत पूर्व हिकिकोमोरी व्यक्ति वर्तमान मामलों से संवाद करते हैं और उन्हें यह यकीन दिलाते हैं कि पुनर्स्थापना संभव है। इस तरह के ‘Peer Support Circles’ उन लोगों के लिए प्रेरणा बन रहे हैं जो अभी भी सामाजिक अलगाव से जूझ रहे हैं। परिवार की भूमिका भी इस प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील और समझदारी भरी बातचीत, बजाय दबाव या शर्मिंदा करने के ज्यादा प्रभावी होती है। इसी उद्देश्य से कई संगठन ‘Family Support Training Programs’ चला रहे हैं। साथ ही टेक्नोलॉजी का सकारात्मक उपयोग भी इस समस्या से लड़ने में मददगार साबित हो रहा है। ऑनलाइन थेरेपी, वीडियो काउंसलिंग और वर्चुअल सपोर्ट ग्रुप जैसे डिजिटल उपायों ने उन युवाओं तक पहुँच आसान बना दी है जो आमने-सामने संपर्क से असहज महसूस करते हैं। कोविड-19 के बाद ये तकनीकी समाधान और भी अधिक जरूरी हो गए हैं।

    अन्य देशों में भी है हिकिकोमोरी जैसी स्थिति?

    हालाँकि ‘हिकिकोमोरी’ शब्द और इसकी अवधारणा की शुरुआत जापान से हुई थी लेकिन अब यह केवल जापानी समाज तक सीमित नहीं रही। हाल के अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों और समीक्षा लेखों में इसे एक ‘साइलेंट ग्लोबल एपिडेमिक’ और गंभीर वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य संकट के रूप में पहचाना गया है। दक्षिण कोरिया, चीन, अमेरिका और भारत जैसे देशों में भी खासकर शहरी युवाओं में लंबे समय तक सामाजिक अलगाव, इंटरनेट और सोशल मीडिया की लत और समाज से जुड़ाव की कमी जैसी प्रवृत्तियाँ तेजी से उभर रही हैं। आधुनिक जीवनशैली में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती पकड़ ने लोगों को आभासी दुनिया में तो जोड़ा है लेकिन असल सामाजिक संपर्कों से दूर कर दिया है। वैश्विक मनोवैज्ञानिक शोध यह दिखाते हैं कि जब व्यक्ति की सामाजिक अपेक्षाएँ अधूरी रह जाती हैं और डिजिटल माध्यम उसके लिए एकमात्र ‘सुरक्षित क्षेत्र’ बन जाते हैं। तब हिकिकोमोरी जैसे व्यवहार दूसरी संस्कृतियों और देशों में भी पनपने लगते हैं। इस प्रकार यह अब एक सीमित सामाजिक मुद्दा नहीं बल्कि पूरी दुनिया में युवाओं की मानसिक स्थिति का चिंताजनक संकेत बन चुका है।

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