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    Home » Chhattisgarh Surguja Tour: क्या घूमा आपने छत्तीसगढ़ का सरगुजा, जहां है रामायण काल का ओपन थिएटर
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    Chhattisgarh Surguja Tour: क्या घूमा आपने छत्तीसगढ़ का सरगुजा, जहां है रामायण काल का ओपन थिएटर

    Janta YojanaBy Janta YojanaAugust 12, 2025No Comments5 Mins Read
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    Chhattisgarh Surguja Tour Guide Check History 

    Chhattisgarh Surguja Tour Guide Check History

    Chhattisgarh Surguja Tour: भारत के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों में कई ऐसे अनमोल रत्न छिपे हैं, जो अभी भी अंजान हैं। इसी तरह का एक प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासतों से संपन्न छत्तीसगढ़ का सरगुजा जिला उन्हीं में से एक है। जहां एक ऐसा इलाका भी है जो रामायण काल से सीधा जुड़ाव रखता है। यहां एशिया का सबसे पुराना ओपन थिएटर देखने को मिलेगा। साथ ही देश का दूसरा राष्ट्रपति भवन भी आपको यहां मौजूद मिलेगा। यहां की रजवार भित्ति चित्र कला ने देश विदेश तक अपनी पहचान बनाई है। यहां की पहाड़ियों, गुफाओं, वास्तुकला और लोककला की कहानी इतिहास और परंपरा के ऐसे पन्ने खोलती है जो हर इतिहास प्रेमी और सांस्कृतिक प्रेमी को आकर्षित करती है। आईए जानते हैं छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले से जुड़ी ऐसी कई खूबियों के बारे में –

    सरगुजा का ऐतिहासिक महत्व

    सरगुजा जिला उत्तरी छत्तीसगढ़ में स्थित है। यह चार राज्य उत्तर प्रदेश, झारखंड, उड़ीसा और मध्य प्रदेश की सीमाओं से सटा हुआ है। इसकी भौगोलिक स्थिति सांस्कृतिक और व्यापारिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्थान बनती है। यहां का प्राकृतिक परिवेश, घने जंगल पहाड़ियां और नदियां जैसी प्राकृतिक संपदाएं इस क्षेत्र को पर्यटन के लिहाज से खास बनाती हैं। सरगुजा के आसपास के क्षेत्र में प्रागैतिहासिक मानव बस्तियों के अवशेष, गुफाएं, प्राचीन मंदिर और स्थापत्य के अद्भुत नमूने आज भी देखने को मिलते हैं। यहां के स्मारक और पुरातात्विक स्थल हजारों साल पुराने इतिहास के गवाह हैं। जो न केवल वहां की स्थानीय संस्कृति बल्कि भारतीय सभ्यता की जड़ों को भी दर्शाते हैं।

    रामगढ़ की सीता बेंगरा गुफा जो है एशिया की सबसे प्राचीन नाट्यशाला

    सरगुजा की सबसे अनोखी और अद्वितीय धरोहर है रामगढ़ पहाड़ियों में स्थित सीता बेंगरा गुफा। जिसे एशिया की सबसे पुरानी नाट्यशाला के तौर पर प्रसिद्धि हासिल है। यह गुफा पहाड़ी के नीचे इस तरह से निर्मित की गई है कि, ये प्राकृतिक रूप से एक ओपन थिएटर का आकार में नजर आती है। यहां एक ऐसा मंच भी है जिसके सामने हजारों दर्शकों के बैठने की जगह बनाई गई है। इस संरचना की खासियत यह है कि मंच पर खड़े होकर बोलने पर आवाज किसी माइक सिस्टम से भी तेज गूंजती है। दूर तक स्पष्ट सुनाई देती है। इस ईको ध्वनि को नियंत्रित करने के लिए मंच पर बनी दीवारों में विशेष रूप से छोटे बड़े छेद भी बनाए गए हैं। जो उस समय की एडवांस ध्वनि विज्ञान और वास्तुकला का सजीव प्रमाण है।

    सिर्फ यही नहीं इस गुफा तक पहुंचने के लिए पहाड़ियों को काटकर बनाई गई करीने से सीढ़ियां भी प्राचीन शिल्प कला की मिसाल पेश करती हैं। यह जगह न केवल वास्तु दृष्टि से अद्वितीय है बल्कि पौराणिक महत्व से भी बेहद खास है। माना जाता है कि रामायण काल में यहां नाट्य प्रस्तुतियां होती थीं।

     गुफा से जुड़ा है कालिदास और मेघदूतम का संबंध

    स्थानीय लोगों के अनुसार यह नाट्यशाला इतनी प्राचीन और महत्वपूर्ण है कि महाकवि कालिदास ने अपनी अमर कृति मेघदूतम की रचना इसी नाट्यशाला के ऊपर स्थित पर्वत पर की थी। लोगों द्वारा बताया जा रहा अगर यह तथ्य सही है, तो यह स्थान केवल पौराणिक काल के लिहाज से ही नहीं बल्कि साहित्यिक दृष्टि से भी अमूल्य हो जाता है।

    राजेंद्र प्रसाद से जुड़ाव रखता यहां मौजूद राष्ट्रपति भवन

    सरगुजा के पास ही सूरजपुर जिले में स्थित है देश का दूसरा राष्ट्रपति भवन। यहां पहुंचने के लिए अंबिकापुर से महेंद्रगढ़ रोड पर लगभग 18 किलोमीटर दूर सिलफिली या फिर ट्रेन से कमालपुर रेलवे स्टेशन तक आना होता है। कमलपुर से राष्ट्रपति भवन केवल 2 किलोमीटर और सिलफिली से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह भवन भारत के राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के राज्य भ्रमण के दौरान उनके ठहरने के लिए बनाया गया था। इसकी बनावट और परिवेश दोनों ही शानदार हैं। जो इसे एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और ऐतिहासिक स्थल बनाते हैं।

    रजवार हाउस की भित्ति चित्रकला- विश्व तक पहुंची सरगुजा की पहचान

    सरगुजा की एक और अनमोल धरोहर है रजवाल हाउस की भित्ति चित्रकला। यह कला शैली दीवारों पर मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बनाई जाती है। जिसमें आदिवासी जीवन, लोक कथाएं और प्रकृति के दृश्य अद्भुत बारीकी से उतारे जाते हैं। इस कला में पारंगत स्वर्गीय सोना बाई और उनके बाद सुंदरी बाई ने इस कला को नहीं ऊंचाई दी और इसे विदेशों तक पहुंचाया। यहां घूमने आया एक विदेशी कला प्रेमी पर्यटक तो इस कला के इतने मुरीद हुए कि वे सरगुजा आए और सोना बाई के जीवन पर एक किताब भी लिख डाली। भित्ति चित्रकला न केवल सरगुजा की सांस्कृतिक पहचान है बल्कि यह भारत की पारंपरिक कलाओं के संरक्षण और संवर्धन का भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।

     सरगुजा और पर्यटन की बढ़ती संभावनाएं

    सरगुजा और उसके आसपास के इन धरोहर स्थलों में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। सरकार और स्थानीय प्रशासन इन जगहों को उचित प्रचार प्रसार और संरक्षण प्रदान करें तो यह देश-विदेश से पर्यटकों के लिए शानदार पर्यटन स्थल के तौर पर यह स्थान अपनी पहचान कायम कर सकता है। रामगढ़ की नाट्यशाला को भारतीय रंगमंच के इतिहास का एक जीवंत दस्तावेज कहा जा सकता है। वहीं राष्ट्रपति भवन प्रशासनिक विरासत का प्रतीक है। रजवार भित्ति चित्रकला तो पहले से ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर सरगुजा का नाम रोशन कर रही है। इतिहास और संस्कृति के इन रत्नों को समय रहते संरक्षित करना बेहद जरूरी है। समय और आधुनिकता की आंधी में कई ऐसी धरोहरें मिट चुकी हैं। अभी जो अभी बची हैं उन्हें तत्काल ध्यान और देखभाल की जरूरत है। नाट्यशाला की दीवारें, सीढ़ियां और ध्वनि व्यवस्था धीरे-धीरे नष्ट हो रही है। रजवार कल भी कलाकारों की घटती संख्या के कारण संकट में है। छत्तीसगढ़ का सरगुजा जिला केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक पौराणिक और साहित्यिक कलात्मक विरासत का एक जीवंत संग्रहालय है। यहां के हर पत्थर हर चित्र हर धरोहर में सदियों पुरानी कहानी छुपी हुई है।

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