
Shri Radha Gopinath Ji Temple Celebration Janmashtami
Shri Radha Gopinath Ji Temple Celebration Janmashtami
Shri Radha Gopinath Ji Temple: जयपुर का श्री राधा गोपीनाथ जी मंदिर जन्माष्टमी के अवसर पर भक्ति और अद्भुत चमत्कारों का संगम बन जाता है। यहां आकर न केवल भगवान श्री कृष्णा और राधा रानी के दिव्य विग्रह का दर्शन होता है बल्कि उन कथाओं और मान्यताओं का भी अनुभव किया जा सकता है जो सदियों से भक्तों के विश्वास को और गहरा करती आई हैं। इस मंदिर में जब मध्य रात्रि का समय होता है और मंदिर की घंटियां शंखनाद और भजन कीर्तन की धुन वातावरण में गूंजती है, तो लगता है मानो स्वयं वृंदावन का आनंद जयपुर में उतर आया हो। आइए जानते हैं इस दिव्य स्थल से जुड़े रहस्य और इसकी खूबियों के बारे में –
वृंदावन से जयपुर तक गोपीनाथ जी की दिव्य यात्रा
श्री राधा गोपीनाथ जी का विग्रह कोई साधारण प्रतिमा नहीं बल्कि भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र बैजनाथ जी द्वारा निर्मित तीन विशेष ठाकुरों के विग्रहों में से एक माना जाता है। मूल रूप से गोपीनाथ जी की यह प्रतिमा वृंदावन में प्रतिष्ठित थी। जहां परमानंद भट्टाचार्य और उनके विशेष शिष्य मधुगोस्वामी जी इनकी पूजा करते थे। लेकिन इतिहास में एक समय ऐसा भी आया जब मुस्लिम आक्रमण के खतरे के कारण वृंदावन के कई विग्रहों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया। इनमें से गोपीनाथ जी को भी सावधानी पूर्वक जयपुर लाया गया और यहां प्रतिष्ठित किया गया। तब से यह मंदिर जयपुर की धार्मिक पहचान और भक्ति का अभिन्न हिस्सा है।
गोपीनाथ जी का द्वितीय स्वरूप और उससे जुड़ा चमत्कार

जयपुर में श्रद्धा का केंद्र बने भगवान गोपीनाथ जी का स्वरूप कंधे से लेकर कमर तक बिल्कुल भगवान श्री कृष्ण जैसा है। उनके चेहरे पर प्रसन्नता की मृदुल छठा और आंखों में करुणा का भाव भक्तों को सम्मोहित करता है। मान्यता है कि यह विग्रह मात्र पत्थर की प्रतिमा नहीं बल्कि भगवान का सजीव रूप है। यह मान्यता एक लोकप्रिय कथा से और भी ज्यादा पुष्ट होती है जिसमें कहा जाता है कि, इस प्रतिमा में आज भी नब्ज की धड़कन महसूस की जा सकती है।
घड़ी और नब्ज की अनोखी कहानी – जिसने ब्रिटिश अधिकारी को कर दिया नतमस्तक
ब्रिटिश शासन के समय यह चर्चा एक अंग्रेज अधिकारी तक पहुंची कि गोपीनाथ जी की प्रतिमा में नब्ज धड़कती है। जांच की इरादे से वह मंदिर आए और अपने साथ एक नब्ज की धड़कन से चलने वाली घड़ी भी साथ लेकर आए। उन्होंने उस घड़ी को मंदिर में स्थापित गोपीनाथ जी की कलाई पर रखा और देखते ही देखते घड़ी चलने लगी। जैसे ही घड़ी कलाई से हटाई वह रुक गई। यह घटना न केवल उस अधिकारी के लिए चमत्कार थी, बल्कि इस घटना के बाद से यह सजीव प्रतिमा भक्तों के विश्वास का भी अटूट हिस्सा बन गई। मंदिर के गोस्वामी जी बताते हैं कि यह आज भी होता है। आज भी गोपीनाथ की कलाई पर वह घड़ी निरंतर चल रही है। यही कारण है कि लोग मानते हैं कि गोपीनाथ जी स्वयं से शरीर मंदिर में विराजते हैं।
स्थापत्य में झलकता है राजस्थानी और ब्रज का संगम
मंदिर की वास्तुकला में राजस्थानी कारीगरी राजस्थान और ब्रजभूमि के मंदिरों की आत्मीयता का सुंदर मेल दिखाई देता है। अलंकृत शिखर, सूक्ष्म नक्काशी, भव्य और रंग-बिरंगे वस्त्रों से सजे विग्रह सब मिलकर एक अद्भुत दृश्य बनाते हैं। आंगन में फूलों की महक, दियों की असंख्य रोशनी से सुसज्जित वातावरण भक्तों को दिव्य लोक में ले जाता है।
जन्माष्टमी पर मंदिर में उमड़ता है भक्ति का सागर

जन्माष्टमी की रात यहां मानों स्वर्ग उतर आता है। इस अवसर पर मंदिर को हजारों सुगंधित फूलो और रंगीन रोशनी से सजाया जाता है। मध्य रात्रि में श्री कृष्ण का अभिषेक दूध, दही, शहद और घी से होता है। यहां सजी दिव्य झांकियों में भगवान की लीलाओं का विविध प्रदर्शन किया जाता है। पालकी यात्रा निकालते हैं। पूरी रात यहां ढोल, मंजीरे और करताल के साथ भजन कीर्तन की मधुर ध्वनि चारों दिशाओं को पवित्र करती है। दूर-दूर से आए हजारों श्रद्धालु इस भव्य आयोजन का हिस्सा बनते हैं और महाप्रसाद पाकर अपने जीवन को धन्य मानते हैं।
दर्शन का समय और भक्तों के लिए मार्गदर्शन
गोपीनाथ मंदिर में दर्शन सुबह 5 बजे से दोपहर 12 बजे तक और शाम 4 बजे से रात 9 बजे तक अनवरत होते हैं। जन्माष्टमी जैसे विशेष अवसरों पर यह समय बढ़ भी जाता है क्योंकि भक्तों की भीड़ देर रात तक बनी रहती है। मंदिर शहर के पुराने हिस्से में स्थित है और यहां रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट से ऑटो या कैब के जरिए आसानी से पहुंचा जा सकता है। इस स्थल के आसपास गोविंद देव जी मंदिर, हवा महल और सिटी पैलेस जैसे दर्शनीय स्थल भी मौजूद हैं। जिनके कारण यह क्षेत्र पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
श्रद्धा इतिहास और चमत्कार का द्वितीय संगम
श्री राधा गोपीनाथ जी मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं बल्कि वह स्थान है जहां इतिहास भक्ति और चमत्कार एक साथ जीवंत होते हैं यहां आने वाला हर भक्त इस अनुभूति के साथ लौटता है कि उसने न केवल भगवान के दर्शन किए बल्कि उनके संजीव स्पष्ट को भी महसूस किया जन्माष्टमी के दिन या अनुभूति और भी गहरी होती है जब जयपुर की गालियां और मंदिर का प्रांगण भक्ति के रंग में पूरी तरह रंग जाते हैं।