
Somnath Temple
Somnath Temple
Somnath Temple: भारतीय इतिहास में सोमनाथ मंदिर केवल पत्थरों से निर्मित एक देवालय नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की अमरता और राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक है। गुजरात के प्रभास पाटन के समुद्र तट पर स्थित यह मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम और सर्वाधिक पूजनीय माना जाता है। इसकी लहरों में आज भी आस्था, संघर्ष और पुनर्निर्माण की गूंज सुनाई देती है।
सोमनाथ का इतिहास
सोमनाथ का इतिहास यह प्रमाणित करता है कि मंदिरों की दीवारें गिराई जा सकती हैं, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था को नहीं। समय-समय पर हुए हमलों के बावजूद यह मंदिर हर बार पहले से अधिक गौरव के साथ खड़ा हुआ और भारतीय चेतना को जीवित रखा।
महमूद गजनवी का आक्रमण और भीषण नरसंहार
11वीं शताब्दी में सोमनाथ पर सबसे भयावह हमला गजनी के शासक महमूद गजनवी ने किया। अक्टूबर 1024 में 30 हजार घुड़सवारों के साथ निकला गजनवी जनवरी 1026 में सोमनाथ पहुंचा। निहत्थे शिवभक्तों, ब्राह्मणों और स्थानीय योद्धाओं ने अदम्य साहस के साथ मंदिर की रक्षा की। 8 जनवरी 1026 को हुए नरसंहार में 50 से 70 हजार श्रद्धालुओं ने आस्था की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। गजनवी ने ज्योतिर्लिंग को खंडित किया और अपार संपदा लूट ली।
बार-बार हुए हमले, पर फिर भी आस्था रहा अडिग
सोमनाथ पर यह हमला अंत नहीं था। 1299 में अलाउद्दीन खिलजी, 14वीं-15वीं शताब्दी में जफर खान और अहमद शाह, तथा 17वीं-18वीं शताब्दी में औरंगजेब ने मंदिर को नष्ट करने का प्रयास किया। इतिहासकारों के अनुसार, इस मंदिर पर लगभग 17 बार आक्रमण हुए, लेकिन हर बार यह राख से उठ खड़ा हुआ।
आजादी के बाद पुनरुद्धार का संकल्प
स्वतंत्र भारत में सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण को राष्ट्र के आत्मसम्मान से जोड़ा। उनके बाद के.एम. मुंशी ने इस कार्य को आगे बढ़ाया। 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भव्य मंदिर का उद्घाटन किया, इसे सांस्कृतिक पुनर्जागरण का उत्सव बताया।
आज का सोमनाथ मंदिर और उसका संदेश क्या है?
आज सोमनाथ मंदिर ‘कैलाश महामेरु’ शैली में निर्मित एक अद्भुत स्थापत्य चमत्कार है। यह मंदिर सिखाता है कि अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः विजय सत्य, विश्वास और आस्था की ही होती है।


