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    Home » Machu Picchu History: बादलों में बसा एक शहर, क्यों कहा जाता है इसे ‘लॉस्ट सिटी’? जवाब चौंका देंगे!
    Tourism

    Machu Picchu History: बादलों में बसा एक शहर, क्यों कहा जाता है इसे ‘लॉस्ट सिटी’? जवाब चौंका देंगे!

    Janta YojanaBy Janta YojanaDecember 12, 2025No Comments7 Mins Read
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    Machu Picchu History

    Machu Picchu History

    Machu Picchu History: दुनिया में कुछ ऐसी ऐतिहासिक जगहें हैं जो जितना देखने-समझने की कोशिश करें, उतना ही गहरी होती जाती हैं। पेरू (Peru) की पहाड़ियों में बादलों के बीच स्थित माचू पिच्चू (Machu Picchu) उन्हीं में से एक है। एंडीज़ पर्वत श्रृंखला की गोद में बसा यह शहर 1911 में दुनिया को फिर से दिखाई दिया, लेकिन इसके बनने का असली कारण और इसके अचानक गायब हो जाने का रहस्य आज भी पूरी तरह नहीं समझा जा सका है। 15वीं सदी में इंका सभ्यता ने इसे बनाया और कुछ समय बाद इसे ऐसे छिपाकर छोड़ दिया कि स्पेनिश विजेता भी इसे नहीं ढूंढ पाए। यही कारण है कि इसे ‘लॉस्ट सिटी ऑफ द इंकाज़’ कहा जाता है।

    शाही शहर या आध्यात्मिक आश्रय, क्या था इसका असली उद्देश्य?

    इस रहस्यमई शहर को लेकर कई इतिहासकार मानते हैं कि माचू पिच्चू कोई साधारण बस्ती नहीं, बल्कि इंका सम्राट पचाकुती का निजी पर्वतीय आश्रय था। राजनीतिक हलचलों और युद्धों से दूर यह जगह राजपरिवार के आराम तथा विशेष अनुष्ठानों के लिए सुरक्षित स्थान के रूप में बनाई गई होगी। वहीं दूसरी सोच यह बताती है कि यह स्थान आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र था। पर्वत, सूर्य और प्रकृति की ऊर्जा को समझने और पूजा करने के लिए यह जगह आदर्श मानी जाती थी। शहर की बनावट को देखकर लगता है कि यहां आध्यात्मिक साधना, सूर्य पूजा और पर्वतीय देवताओं के प्रति सम्मान का विशेष महत्व था।

    यहां मौजूद थी खगोलीय वेधशाला जहां सूर्य की चाल से तय होते थे मौसम और कैलेंडर

    माचू पिच्चू की वास्तुकला खुद यह संकेत देती है कि इंका लोग खगोलशास्त्र में बेहद उन्नत थे। शहर के मंदिरों, खिड़कियों और पत्थरों की दिशा ऐसी है कि सूर्य के अयनांत (solstice) और विषुव (equinox) के दिन सूर्य की किरणें बिल्कुल तय स्थानों पर पड़ती हैं।

    इंटिहुआताना नाम का प्रसिद्ध पत्थर सूर्य की गति मापने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। सूर्य मंदिर की खिड़कियां इस तरह बनाई गई हैं कि साल में दो बार सूरज की पहली रोशनी सीधे अंदर गिरे। इससे मौसम का अनुमान, फसलों की योजना और धार्मिक अनुष्ठानों का समय तय किया जाता था। यह स्पष्ट करता है कि माचू पिच्चू सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि खगोलीय अध्ययन का केंद्र भी था।

    इंका इंजीनियरिंग – जहां बिना सीमेंट के खड़ी हैं सैकड़ों साल पुरानी दीवारें

    समुद्र तल से करीब 8,000 फीट की ऊंचाई पर बने इस शहर को देखकर आधुनिक विशेषज्ञ भी आश्चर्य में पड़ जाते हैं। बिना धातु के औजारों और बिना पहिए के पत्थरों को तराशने की उनकी तकनीक इतनी सटीक थी कि आज भी दीवारों के पत्थरों के बीच एक पतला ब्लेड भी नहीं डाला जा सकता।

    इंका की पत्थर-संधान तकनीक इस तरह बनाई गई थी कि भूकंप आने पर दीवारें हिलें, झुकें, पर वापस अपनी जगह ठीक से जम जाएं। यह इंजीनियरिंग आज की दुनिया में भी चमत्कार मानी जाती है। शहर में पानी लाने के लिए बनाई गई नालियां और जल-निकासी की व्यवस्था आज भी काम करती है। सीढ़ीनुमा खेतों की संरचना मिट्टी को बहने से बचाती है, जिससे पता चलता है कि इंका लोग पहाड़ों पर खेती करने के उस्ताद थे।

    कृषि प्रयोगशाला – विभिन्न जलवायु में फसलें उगाने का केंद्र

    माचू पिच्चू के टेरेस्ड खेत यह बताते हैं कि यहां सिर्फ खेती नहीं होती थी, बल्कि फसलों के प्रयोग भी किए जाते थे। अलग-अलग ऊंचाइयों पर स्थित खेतों में तापमान और नमी का अंतर होता है, जिससे फसलों की कई किस्मों के विकास का परीक्षण किया जा सकता था। माना जाता है कि इंका साम्राज्य की भोजन व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए यहां कृषि अनुसंधान होता था। आलू, क्विनोआ, मक्का जैसी फसलों की उन्नत किस्में इंका के इसी शोध का परिणाम थीं।

    अचानक क्यों छोड़ दिया गया शहर- आज भी सबसे बड़ा रहस्य

    16वीं सदी में जब स्पेनिश आक्रमणकारियों ने इंका साम्राज्य को तहस-नहस कर दिया, तब कई शहर नष्ट हो गए, पर माचू पिच्चू पूरी तरह सुरक्षित रहा।

    क्योंकि इसे पहले ही खाली कर दिया गया था। इंका लोगों ने शायद इस शहर को छिपाने के लिए जंगलों और पर्वतों की गहराई में छोड़ दिया। ताकि आक्रमणकारी इसे न ढूंढ पाएं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि महामारी, युद्ध और राजनीतिक विघटन के कारण लोग इसे छोड़कर चले गए। चूंकि स्पेनिश इसे कभी नहीं ढूंढ पाए, इसलिए यह शहर लगभग 400 साल तक दुनिया से गायब रहा।

    कैसे और किसने की माचू पिच्चू की खोज

    माचू पिच्चू की खोज इतिहास की सबसे दिलचस्प घटनाओं में से एक है। यह शहर लगभग चार सौ साल तक घने जंगलों, बादलों और पहाड़ियों के बीच छिपा रहा। इसका पता दुनिया को तब चला जब 1911 में अमेरिकी खोजकर्ता हिरम बिंघम इंका साम्राज्य के आखिरी ठिकाने विल्काबांबा की तलाश में पेरू पहुंचे। उनका लक्ष्य एक ऐसे गुप्त शहर को ढूंढना था जहां इंका शासक स्पेनिश हमलावरों से बचकर रहते थे। लेकिन किस्मत उन्हें एक बिल्कुल अलग और अप्रत्याशित दिशा में ले गई। उनकी खोज की शुरुआत तब हुई जब उरुबांबा नदी घाटी के पास एक स्थानीय किसान मेल्कोर आर्टियागा ने उन्हें बताया कि ऊपर घने जंगलों से ढकी पहाड़ी पर किसी पुराने शहर के अवशेष मौजूद हैं। बिंघम को यह बात किसी लोककथा जैसी लगी, लेकिन उत्सुकता के कारण उन्होंने तुरंत उस रास्ते पर चढ़ाई शुरू की। खड़ी चढ़ाई, फिसलन भरे रास्ते और घने पेड़ों के बीच घंटों की जद्दोजहद के बाद बिंघम पहाड़ी की चोटी पर पहुंचे। वहां उन्हें दो स्थानीय बच्चे मिले जिन्होंने उन्हें उन खंडहरों तक पहुंचाया। जहां पहुंचकर बिंघम की आंखें आश्चर्य से भर गईं।

    घास और बेलों से पूरी तरह ढका हुआ एक विशाल पत्थरों का शहर उनके सामने था। जो आकार और बनावट में बिल्कुल इंका शैली का था। यहां की दीवारें, सीढ़ियां, खिड़कियां और मंदिर इतने सलीके से बने थे कि बिंघम तुरंत समझ गए कि यह कोई साधारण बस्ती नहीं, बल्कि इतिहास का एक बहुत बड़ा रहस्य है। उन्होंने उसी दिन से इसे ‘लॉस्ट सिटी ऑफ द इंकाज़’ कहना शुरू कर दिया। क्योंकि उन्हें विश्वास था कि यही वह गायब शहर है जिसका जिक्र पुराने ग्रंथों में मिलता है। हालांकि बाद के शोधों में पता चला कि असली ‘लॉस्ट सिटी’ विल्काबांबा थी। लेकिन बिंघम की खोज ने दुनिया की नजर को पहली बार माचू पिच्चू की ओर मोड़ दिया। स्थानीय ग्रामीण इस जगह से पहले से परिचित थे और आसपास खेती भी करते थे, लेकिन यह ज्ञान कभी बाहरी दुनिया तक नहीं पहुंचा। इसलिए यह खोज वास्तव में छिपी हुई धरोहर को दुनिया के सामने लाने की एक पुनः खोज थी।

    बिंघम ने बाद में यहां विस्तृत खुदाई करवाई और कई पुरातात्विक वस्तुएं अमेरिका ले गए, जिन्हें दशकों बाद पेरू को वापस किया गया। उनकी इस खोज ने भूले-बिसरे शहर माचू पिच्चू को दुनिया के नक्शे पर स्थापित किया।

    अनसुलझे सवाल- क्या यह महल था, मंदिर था या वैज्ञानिक केंद्र?

    इतने शोध के बाद भी कई सवाल अब भी बने हुए हैं। क्या यह वास्तव में पचाकुती का निजी महल था? क्या यहां विशेष धार्मिक अनुष्ठान किए जाते थे? क्या इसकी बनावट किसी खगोलीय संरेखण को दर्शाती है? यह शहर कितने वर्षों तक आबाद रहा? और अचानक इसे क्यों छोड़ा गया?

    अधिकांश विशेषज्ञों का मानना है कि माचू पिच्चू किसी एक उद्देश्य के लिए नहीं, बल्कि कई उद्देश्यों के लिए बनाया गया था। यही चीज इसके रहस्य को और गहरा करती है।

    आधुनिक शोध और नई तकनीकों से खुल रहे नए रहस्य

    आज ड्रोन मैपिंग, 3D स्कैनिंग और रेडियोकार्बन डेटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों से पता चल रहा है कि इसका आकार पहले से कहीं बड़ा था। शहर के आसपास छिपे रास्ते, सुरंगें और छोटी-छोटी बस्तियां मिल रही हैं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यहां रहने वाले लोग पूरे साम्राज्य से चुने गए विशेषज्ञ थे, जिनमें कृषि विशेषज्ञ, खगोलशास्त्री, शिल्पकार और पुजारी शामिल हैं।

    माचू पिच्चू सिर्फ पत्थरों का शहर नहीं, बल्कि एक ऐसी अनोखी धरोहर है जिसमें आध्यात्मिकता, विज्ञान, खगोलशास्त्र और इंजीनियरिंग सब साथ जुड़े हुए हैं। इंका सभ्यता की उन्नत सोच और प्रकृति के प्रति सम्मान को समझने के लिए इससे बेहतर उदाहरण दुनिया में शायद ही कहीं मिले। आज भी माचू पिच्चू की खोज की यह कहानी उतनी ही रोमांचक लगती है, जितनी किसी फेयरी टेल सुनने पर महसूस होता है। एक ऐसा शहर जिसे इंका लोगों ने प्रकृति की आड़ में इतनी खूबसूरती से छिपाया कि दुनिया को उसे खोजने में सदी लग गई।

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