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    Home » Seetha Amman Mandir Story: रामायण से जुड़ा वह पवित्र स्थल जहाँ रावण ने सीता माता को रखा था बंदी, जानिए श्रीलंका के सीता अम्मन मंदिर का इतिहास
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    Seetha Amman Mandir Story: रामायण से जुड़ा वह पवित्र स्थल जहाँ रावण ने सीता माता को रखा था बंदी, जानिए श्रीलंका के सीता अम्मन मंदिर का इतिहास

    Janta YojanaBy Janta YojanaAugust 2, 2025No Comments10 Mins Read
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    Seetha Amman Temple Story

    Seetha Amman Temple Story

    Seetha Amman Temple History: श्रीलंका की हरी-भरी वादियों और शांत वातावरण के बीच स्थित सीता अम्मन मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक धरोहर और आस्था का जीवंत प्रतीक है। नुवारा एलिया की पहाड़ियों में बसे इस मंदिर का हर पत्थर, हर कोना, देवी सीता के त्याग, धैर्य और अद्वितीय चरित्र की कथा कहता है। मान्यता है कि यही वह पावन स्थान है जहाँ रावण ने माता सीता को अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा था। यह मंदिर न केवल रामायण कालीन घटनाओं की स्मृति को जीवित रखता है, बल्कि भारत और श्रीलंका के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों को भी गहराई से दर्शाता है। सीता अम्मन मंदिर, श्रद्धालुओं के लिए एक ऐसा स्थल है जहाँ आस्था, इतिहास और दिव्यता एक साथ अनुभव होती है।

    मंदिर का भूगोल और स्थिति

    सीता अम्मन मंदिर, श्रीलंका के नुवारा एलिया जिले के सीता एलिया नामक सुरम्य गाँव में स्थित है। यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 1,758 मीटर (करीब 5,770 फीट) की ऊँचाई पर बसा है, जो इसे प्राकृतिक रूप से भी एक विशिष्ट स्थान बनाता है। चारों ओर फैली हरी-भरी पहाड़ियाँ, घने जंगल, पर्वतीय रास्ते और झरनों की मनमोहक ध्वनि इस स्थल को एक आध्यात्मिक अनुभव में बदल देती है। मंदिर के समीप एक पवित्र नदी बहती है, जिसे श्रद्धालु ‘सीता गंगा’ या ‘सीता नदी’ कहते हैं। मान्यता है कि माता सीता ने इसी नदी में स्नान किया था और इसी स्थल पर अपने दुख और वियोग के दिनों में ध्यान व प्रार्थना की थी। यहीं पास की चट्टानों पर हनुमान जी के पदचिह्नों को आज भी एक दिव्य प्रमाण के रूप में पूजा जाता है। मंदिर के ठीक पास स्थित हक्कगला बोटैनिकल गार्डन, जिसे अशोक वाटिका भी कहा जाता है, इस पौराणिक स्थल को और भी ऐतिहासिक महत्व प्रदान करता है।

    इतिहास और निर्माण की पृष्ठभूमि

    सीता अम्मन मंदिर का निर्माण 19वीं शताब्दी में उस समय हुआ, जब ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से तमिल मजदूरों को श्रीलंका लाया गया। इन श्रमिकों ने जब नुवारा एलिया के सीता एलिया गाँव के इस पावन स्थल को देखा, तो उन्होंने इसे माता सीता के तप और कष्टों से जुड़ा दिव्य स्थान मानते हुए यहाँ मंदिर की स्थापना की। इससे पहले यह स्थान केवल एक प्राकृतिक आराधना स्थल के रूप में जाना जाता था। जहाँ पत्थरों पर उकेरी गई मूर्तियाँ या प्रतीक चिन्ह माता सीता, भगवान राम और लक्ष्मण के रूप में पूजे जाते थे। मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारतीय ड्रविड़ शैली से प्रेरित है, जिसमें सुंदर रंगीन मूर्तियाँ, नकाशीदार छत और भव्य शिखर इसकी कलात्मकता को दर्शाते हैं। इसके साथ ही, इस मंदिर में श्रीलंकाई स्थापत्य शैली और अशोक वृक्षों का भी समावेश दिखाई देता है। जो इसे एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संगम का स्वरूप प्रदान करता है।

    रामायण और सीता अम्मन मंदिर का संबंध

    सीता अम्मन मंदिर को रामायण की दिव्य घटनाओं का सजीव प्रमाण माना जाता है। वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास रचित रामचरितमानस के अनुसार, रावण ने माता सीता का हरण कर उन्हें बलपूर्वक अपनी पत्नी बनाने का प्रस्ताव रखा। लेकिन माता सीता ने दृढ़ निश्चय और पतिव्रता धर्म के साथ यह प्रस्ताव ठुकरा दिया और प्रतिज्ञा की कि वह केवल अपने पति श्रीराम के विषय में ही सोचेंगी। रावण ने उन्हें अपने महल में न रखकर अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा, इस आशा में कि समय के साथ उनका मन बदल जाएगा। परंतु माता सीता ने श्रीराम का अडिग स्मरण और तपस्या करते हुए अपना समय व्यतीत किया।

    सीता अम्मन मंदिर को आज जिस स्थल पर स्थापित माना जाता है, उसे ही प्राचीन अशोक वाटिका का स्थान माना जाता है जहाँ रावण ने माता सीता को बंदी बनाकर रखा था।। यह स्थान श्रीलंका के हक्कगला बोटैनिकल गार्डन के निकट स्थित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यही वह स्थान है जहाँ हनुमान जी पहली बार माता सीता से मिले और उन्हें भगवान राम का संदेश एवं उनकी मुद्रिका (अंगूठी) भेंट की। यह घटना माता सीता के लिए आशा की किरण बनी, जिससे उन्हें विश्वास हुआ कि श्रीराम शीघ्र ही उन्हें मुक्त करने आएंगे।

    वियोग की स्थिति में माता सीता ने अपनी चूड़ामणि हनुमान जी को दी, ताकि वह इसे श्रीराम को सौंपकर उनकी भेंट का प्रमाण प्रस्तुत कर सकें। हनुमान जी यह चूड़ामणि लेकर लौटे और इसी के बाद लंका पर युद्ध की योजना बनी, जिससे राम-रावण युद्ध का सूत्रपात हुआ।

    इसके अतिरिक्त, मंदिर परिसर से बहने वाली सीता गंगा (या सीता झील) को वह पावन नदी माना जाता है जिसमें माता सीता ने स्नान किया था। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इसी नदी के किनारे की चट्टानों पर आज भी हनुमान जी के चरणचिह्न मौजूद हैं।

    इस प्रकार सीता अम्मन मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि रामायण की घटनाओं का जीवंत और आध्यात्मिक प्रतीक भी है। जो हर भक्त को सीता माता की श्रद्धा, तपस्या और शक्ति की याद दिलाता है। यही कारण है कि यह मंदिर आस्था, इतिहास और संस्कृति का संगम बन चुका है।

    मंदिर से जुड़ी प्रमुख मान्यताएं और स्थल

    सीता गंगा (Sita Ganga) – मंदिर के पास बहने वाली एक छोटी नदी को स्थानीय रूप में ‘सीता गंगा’ या ‘सीता एलिया नदी’ कहा जाता है। लोकप्रिय मान्यता है कि यहाँ माता सीता ने अपने वास के दौरान स्नान किया था और श्रद्धालु आज भी इस पवित्र जल को अपने साथ ले जाते हैं।

    पांवों के निशान – मंदिर परिसर में एक बड़ी चट्टान पर स्पष्ट निशान दिखते हैं, जिन्हें ‘सीता के चरण चिन्ह’ कहा जाता है। स्थानीय जन इन्हें देवी सीता के पैरों के निशान मानते हैं और इन पर पुष्प अर्पित करते हैं।

    हनुमान जी की उपस्थिति – मान्यता है कि हनुमान जी ने पहली बार यहीं अशोक वाटिका (वर्तमान सीता एलिया) में माता सीता से भेंट की थी। मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ति भी स्थापित है।

    अशोक वृक्षों की उपस्थिति – मंदिर के आसपास और पीछे अशोक के वृक्ष आज भी देखे जा सकते हैं। परंपरा यह मानती है कि इन्हीं वृक्षों के नीचे माता सीता बैठकर राम की प्रतीक्षा करती थीं और यह स्थल ‘अशोक वाटिका’ का प्रतीक माना जाता है।

    मंदिर की वास्तुकला और विशेषताएँ

    सीता अम्मन मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारतीय द्रविड़ शैली से प्रेरित है, जो इसकी धार्मिक गरिमा और कलात्मक भव्यता को दर्शाती है। मंदिर में प्रमुख रूप से शिखर (गोपुरम), गर्भगृह और सभा मंडप की पारंपरिक संरचना देखने को मिलती है। मंदिर के मुख्य द्वार पर देवी सीता माता की सुंदर और रंगीन मूर्तियाँ स्थापित हैं, जिन्हें दक्षिण भारतीय शैली में अत्यंत नयनाभिराम ढंग से अलंकृत किया गया है। गर्भगृह के भीतर माता सीता के साथ भगवान राम और लक्ष्मण की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं, जो श्रद्धालुओं को रामायण की स्मृतियों से जोड़ती हैं। मंदिर परिसर के एक कोने में हनुमान जी की मूर्ति भी स्थापित है जो उनकी सेवा, भक्ति और वीरता का प्रतीक मानी जाती है।

    मंदिर की दीवारों और सजावट में रामायण की प्रमुख घटनाओं को सुंदर चित्रों और शिल्पकृतियों के माध्यम से उकेरा गया है। इनमें सीता हरण, हनुमान जी की लंका यात्रा, अशोक वाटिका में सीता-हनुमान संवाद और रावण वध जैसे दृश्य विशेष रूप से दर्शनीय हैं। यह चित्रण न केवल मंदिर की शोभा बढ़ाते हैं, बल्कि श्रद्धालुओं को रामायण के प्रसंगों से आत्मिक रूप से जोड़ते हैं।

    मंदिर में होने वाले प्रमुख धार्मिक आयोजन

    रामनवमी – सीता अम्मन मंदिर रामनवमी के अवसर पर विशेष भक्ति और उल्लास का केंद्र बन जाता है। भगवान राम के जन्मोत्सव पर यहाँ भव्य पूजा, भजन संध्या और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। चूंकि यह मंदिर सीता माता और रामायण की घटनाओं से सीधा जुड़ा है, इसलिए रामनवमी पर यह स्थल श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है।

    विजयदशमी (दशहरा) – दशहरे के दिन, जब भगवान राम ने रावण का वध कर धर्म की विजय सुनिश्चित की थी। इस मंदिर में विशेष आरती, यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इस अवसर पर न केवल श्रीलंका बल्कि भारत और अन्य देशों से भी श्रद्धालु यहाँ पहुंचते हैं। श्रीलंका में स्थित होने के बावजूद, मंदिर दशहरे को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाता है।

    हनुमान जयंती – हनुमान जयंती के दिन मंदिर में सुंदरकांड पाठ, हवन और विशेष पूजन का आयोजन होता है। चूंकि मंदिर परिसर में हनुमान जी की एक अलग मूर्ति भी स्थापित है इसलिए इस दिन बड़ी संख्या में हनुमान भक्त यहाँ एकत्र होते हैं।

    भारत-श्रीलंका रामायण सर्किट में मंदिर की भूमिका

    रामायण सर्किट परियोजना भारत सरकार की एक प्रमुख सांस्कृतिक और पर्यटन पहल है जिसे पर्यटन, संस्कृति और पर्यावरण मंत्रालय के सहयोग से विकसित किया जा रहा है। इस योजना का उद्देश्य रामायण महाकाव्य से जुड़े धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक स्थलों को एक-दूसरे से जोड़कर एक समर्पित तीर्थ यात्रा मार्ग तैयार करना है। भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य रामायण संबंधी स्थलों को इस परियोजना में प्राथमिकता दी गई है।

    चूंकि रामायण की कथा में श्रीलंका का विशेष स्थान है जहाँ रावण ने माता सीता को अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा था । इसलिए नुवारा एलिया जिले में स्थित सीता अम्मन मंदिर, अशोक वाटिका और अन्य संबंधित पौराणिक स्थलों को भी इस परियोजना में जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

    यह परियोजना भारत और श्रीलंका के बीच धार्मिक, सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। दोनों देश मिलकर सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और धार्मिक पर्यटन के संवर्धन में सहयोग कर रहे हैं, जिससे रामायण सर्किट एक आध्यात्मिक सेतु का कार्य कर रहा है। इस क्रम में सीता अम्मन मंदिर को न केवल रामायण का प्रतीकात्मक स्थल माना गया है, बल्कि भारत-श्रीलंका की साझा सांस्कृतिक विरासत का एक मजबूत स्तंभ भी स्वीकार किया गया है।

    पर्यटन और आधुनिक महत्व

    सीता अम्मन मंदिर रामायण की प्रमुख घटनाओं से जुड़े होने के कारण श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पूज्य और महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। यहाँ भारत, श्रीलंका, नेपाल सहित अनेक देशों से श्रद्धालु पूजा-अर्चना और दर्शन के लिए बड़ी संख्या में आते हैं। स्थानीय जनसमुदाय की इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था और भक्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जो इसे और भी पवित्र बना देती है।

    यह मंदिर केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के रूप में भी जाना जाता है। इसकी द्रविड़ शैली की वास्तुकला, ऐतिहासिकता और पौराणिकता पर्यटकों को आकर्षित करती है। साथ ही, इसके आसपास का प्राकृतिक सौंदर्य जैसे हरी-भरी पहाड़ियाँ, शांत झरने, सीता गंगा नदी और पर्वतीय दृश्य यहाँ आने वाले लोगों को प्रकृति और अध्यात्म के अद्भुत संगम का अनुभव कराते हैं।

    मंदिर के आसपास रहने वाले स्थानीय लोग श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सेवा और आतिथ्य में सदैव तत्पर रहते हैं। उनकी आत्मीयता और सहयोग भाव, यात्रियों के धार्मिक और सांस्कृतिक अनुभव को और भी सार्थक और स्मरणीय बना देता है। यही विशेषताएँ सीता अम्मन मंदिर को एक विश्वस्तरीय आध्यात्मिक और पर्यटन स्थल के रूप में स्थापित करती हैं।

    सीता अम्मन मंदिर कैसे पहुँचें?

    सीता अम्मन मंदिर, श्रीलंका के नुवारा एलिया जिले के सेथा एलिया (Seetha Eliya) नामक गाँव में स्थित है। भारत से श्रीलंका के कोलंबो स्थित बंडारनायके अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे तक नियमित उड़ानें उपलब्ध हैं। कोलंबो से नुवारा एलिया की दूरी लगभग 160 किलोमीटर है, जिसे सड़क मार्ग से तय करने में 5 से 6 घंटे का समय लगता है।

    नुवारा एलिया से मंदिर की दूरी करीब 4 से 5 किलोमीटर है जहाँ तक टैक्सी, ऑटो या स्थानीय गाइड की मदद से आसानी से पहुँचा जा सकता है। वहीं, नैनू ओया (Nanu Oya) रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी लगभग 10 से 12 किलोमीटर है जिसे टैक्सी या बस द्वारा तय किया जा सकता है।

    कोलंबो से नैनू ओया तक ट्रेन सेवा भी उपलब्ध है, जो सुंदर पहाड़ी रास्तों से होकर गुजरती है और एक मनमोहक यात्रा अनुभव प्रदान करती है। नुवारा एलिया से मंदिर तक स्थानीय यात्री टैक्सी, ऑटो, या किराए के स्कूटर से जाते हैं। वहीं कुछ पर्यटक ट्रेकिंग का आनंद भी लेते हैं क्योंकि मार्ग प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है।

    मंदिर प्रत्येक दिन सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक दर्शन के लिए खुला रहता है। चूंकि यह क्षेत्र पहाड़ी और वर्षा-प्रवण है, इसलिए यात्रा से पहले मौसम की जानकारी लेना लाभकारी होगा । भारत से श्रीलंका की यात्रा हेतु वैध पासपोर्ट और वीज़ा आवश्यक हैं। इसलिए यात्रा की योजना बनाते समय इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।

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