बिहार की राजनीति में अपनी पहचान बनाने वाले विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के संस्थापक और पूर्व मंत्री मुकेश सहनी अब उत्तर प्रदेश में दस्तक दे रहे हैं। 11 अप्रैल को लखनऊ में उनके आगमन से यूपी की सियासत गरमा गई है। उनका मुख्य उद्देश्य निषाद समुदाय के लिए आरक्षण की पुरानी मांग को फिर से उठाना और इस लड़ाई को एक नई गति देना है। 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले, मुकेश सहनी का यह कदम यूपी की राजनीतिक दिशा को किस तरह प्रभावित करेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। क्या निषाद वोट बैंक को साधने की यह रणनीति भाजपा और अन्य दलों के लिए नई चुनौतियां खड़ी करेगी?
निषाद आरक्षण की पुरानी मांग और वर्तमान स्थिति
आरक्षण का इतिहास और राजनीतिक वादे
उत्तर प्रदेश में निषाद समुदाय को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा देने की मांग दशकों पुरानी है। यह समुदाय मुख्य रूप से मछुआरा और नदी-आधारित व्यवसायों से जुड़ा है, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा माना जाता है।
दशकों पुरानी मांग: निषाद समुदाय खुद को SC श्रेणी में शामिल करने की मांग करता रहा है, लेकिन इसे अभी तक पूरा नहीं किया गया है।
चुनावी वादे: हर चुनाव से पहले राजनीतिक दल इस समुदाय को आरक्षण का लाभ दिलाने का आश्वासन देते रहे हैं। 2017 और 2022 के यूपी विधानसभा चुनावों के दौरान भी भाजपा ने निषादों को आरक्षण दिलाने का वादा किया था, लेकिन यह अभी भी ठंडे बस्ते में है।
सरकारी अनुशंसा: यूपी सरकार ने एक बार निषाद आरक्षण के लिए केंद्र को अनुशंसा भेजी थी, लेकिन इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
यूपी में निषाद समुदाय का राजनीतिक महत्व
यूपी में निषाद समुदाय की आबादी काफी बड़ी है और यह कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है।
बड़ा वोट बैंक: पूर्वी यूपी और मध्य यूपी के कई जिलों में निषादों की अच्छी खासी आबादी है।
*निर्णायक भूमिका: करीब 160 विधानसभा सीटों पर निषाद वोट किसी भी उम्मीदवार की जीत-हार तय करने की क्षमता रखते हैं।
*प्रमुख राजनीतिक दल: भाजपा ने संजय निषाद की निषाद पार्टी के साथ गठबंधन करके इस वोट बैंक को साधने की कोशिश की है। अब मुकेश सहनी की एंट्री से मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है।
मुकेश सहनी की रणनीति: बिहार से यूपी तक का सफर
कार्यकर्ता सम्मेलन और मुख्यमंत्री से सवाल
मुकेश सहनी के लखनऊ आगमन का मुख्य एजेंडा निषाद आरक्षण आंदोलन को तेज करना है।
विशाल कार्यकर्ता सम्मेलन: 11 अप्रैल को लखनऊ में एक विशाल कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा, जहाँ सहनी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार करेंगे।
मुख्यमंत्री से प्रश्न: सहनी सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सवाल पूछेंगे कि जब यूपी में डबल इंजन की सरकार है, तो निषादों को आरक्षण क्यों नहीं मिल पाया?
जागरूकता अभियान: उनका लक्ष्य निषाद समुदाय को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना और उन्हें एकजुट करना है।
2027 विधानसभा चुनाव पर असर
मुकेश सहनी का यह कदम सिर्फ एक आरक्षण आंदोलन नहीं, बल्कि 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों की तैयारी के तौर पर भी देखा जा रहा है।
नए विकल्प की तलाश: निषाद समुदाय लंबे समय से आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहा है और अब तक कोई ठोस परिणाम न मिलने से उनमें निराशा है। सहनी खुद को एक नए और सशक्त विकल्प के रूप में पेश कर सकते हैं।
वोट बैंक में सेंध:*संजय निषाद की निषाद पार्टी फिलहाल भाजपा के साथ है। मुकेश सहनी का लक्ष्य इस वोट बैंक में सेंध लगाना और अपना जनाधार बढ़ाना होगा।
अन्य दलों पर दबाव: सहनी का आंदोलन भाजपा के साथ-साथ समाजवादी पार्टी और बसपा जैसे अन्य प्रमुख दलों पर भी निषाद आरक्षण के मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाने का दबाव बढ़ाएगा।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया और आगे की राह
मुकेश सहनी के यूपी में सक्रिय होने से भाजपा और सहयोगी दल निषाद पार्टी के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं। निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद पर भी अपने समुदाय की मांगों को पूरा करने का दबाव बढ़ेगा। अन्य विपक्षी दल, जैसे समाजवादी पार्टी, भी इस स्थिति का लाभ उठाने का प्रयास कर सकते हैं। आने वाले समय में निषाद आरक्षण का मुद्दा यूपी की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता दिख रहा है, और मुकेश सहनी इस समीकरण में एक नया मोड़ ला सकते हैं।
Conclusion:
मुकेश सहनी का उत्तर प्रदेश में प्रवेश निषाद आरक्षण के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर सुर्खियों में ला रहा है। 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले, उनका यह कदम न केवल निषाद समुदाय के लिए उम्मीद की एक नई किरण जगा सकता है, बल्कि यूपी की राजनीतिक बिसात पर भी एक बड़ा बदलाव ला सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी रणनीति कितनी सफल होती है और क्या वे वास्तव में निषाद वोट बैंक को अपने पक्ष में कर पाते हैं।


