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    Home » Duniya Ka Sabse Mota Desh: खनिज संपदा से पर्यावरणीय विनाश तक, जानिए दुनिया के सबसे मोटे देश की अनसुनी कहानी
    Tourism

    Duniya Ka Sabse Mota Desh: खनिज संपदा से पर्यावरणीय विनाश तक, जानिए दुनिया के सबसे मोटे देश की अनसुनी कहानी

    By March 10, 2025No Comments8 Mins Read
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    Most Obese Country (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    Most Obese Country (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    The Most Cigarette-Addicted And Obese Country: दुनिया में कई ऐसे देश हैं जो अपनी अनोखी और अजीबोगरीब पहचान के लिए मशहूर हैं। ये पहचान उनके अजीब कानूनों, रहन-सहन, परंपराओं, भौगोलिक विशेषताओं या अन्य अनूठी वजहों से बनी होती है। एक ऐसाही देश है शायद ही लोग इस देश के बारे में जानते हैं। नाउरूकी पहचान इसके छोटे आकार, राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट, और कई सामाजिक-पर्यावरणीय समस्याओं के कारण अलग बनती है। आइए इस देश के बारे में विस्तार से जानें।

    कहां स्थित है नाउरू (Where is Nauru Located)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    नाउरू (Nauru) प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में स्थित एक छोटा द्वीपीय देश है। यह माइक्रोनेशिया क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्व में स्थित है। नाउरू दुनिया के सबसे छोटे स्वतंत्र देशों में से एक है और इसका कोई आधिकारिक राजधानी शहर नहीं है। यह दुनिया का सबसे छोटा गणराज्य भी है।

    दुनिया का तीसरा सबसे छोटा देश (Third Smallest Country In The World)

    नाउरू (Nauru) का कुल क्षेत्रफल मात्र 21 वर्ग किलोमीटर है, जिससे यह दुनिया का तीसरा सबसे छोटा देश बन जाता है (वेटिकन सिटी और मोनाको के बाद)। यहां की आबादी लगभग 10,800 है। जो इसे दुनिया के सबसे कम आबादी वाले देशों में से एक बनाती है।

    नाउरू का इतिहास (Nauru History In Hindi)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    नाउरू का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। यह द्वीप माइक्रोनेशियन और पोलिनेशियन लोगों द्वारा बसा हुआ था। 18वीं शताब्दी में यूरोपीय खोजकर्ताओं ने इसे खोजा, और 1888 में यह जर्मन साम्राज्य का हिस्सा बन गया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, ऑस्ट्रेलिया ने इसे अपने कब्जे में ले लिया और बाद में यह लीग ऑफ नेशंस (League of Nations) के अधीन आ गया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने इस पर कब्जा कर लिया, लेकिन 1945 में इसे पुनः ऑस्ट्रेलिया के प्रशासन में दे दिया गया। 31 जनवरी 1968 को नाउरू ने स्वतंत्रता प्राप्त की।

    भूगोल और जलवायु

    नाउरू एक छोटा द्वीप देश है, जो ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्व में प्रशांत महासागर में स्थित है। यह समुद्र से घिरा हुआ है और भूमध्य रेखा के पास होने की वजह से यहाँ का मौसम गर्म और नम रहता है। नाउरू में कोई बड़ी नदियाँ या झीलें नहीं हैं। इसका ज्यादातर हिस्सा ऊँचा और सूखा है, लेकिन तटीय इलाकों में नारियल के पेड़ और कुछ अन्य हरे-भरे पौधे पाए जाते हैं।

    नाउरू की अर्थव्यवस्था (Nauru’s Economy)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    20वीं सदी के मध्य में नाउरूदुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक था। इसकी अर्थव्यवस्था का मुख्य स्रोत फॉस्फेट खनन था, जिसे यहां के लोग बेचकर भारी मुनाफा कमाते थे। लेकिन अत्यधिक खनन के कारण 1990 के दशक तक नाउरू की फॉस्फेट खदानें लगभग खत्म हो गईं। इसके कारण प्राकृतिक संसाधन समाप्त हो गए और देश आर्थिक संकट में चला गया। वर्तमान में, नाउरू की अर्थव्यवस्था सरकारी सहायता, विदेशी निवेश, और ऑफशोर बैंकिंग पर निर्भर है।

    फॉस्फेट खनन – नाउरू में 20वीं शताब्दी के दौरान उच्च गुणवत्ता वाले फॉस्फेट का खनन किया गया था।

    मत्स्य पालन – मछली पकड़ना नाउरू के लोगों की आजीविका का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    ऑस्ट्रेलिया पर निर्भरता – ऑस्ट्रेलिया नाउरू को आर्थिक सहायता प्रदान करता है, और यहां एक शरणार्थी केंद्र भी स्थापित किया गया है जिससे देश को राजस्व प्राप्त होता है।

    संस्कृति और समाज

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    नाउरू की संस्कृति माइक्रोनेशियन परंपराओं से प्रभावित है। यहाँ के लोग सामुदायिक जीवनशैली अपनाते हैं और पारंपरिक संगीत, नृत्य और खेलों में रुचि रखते हैं।

    भाषा – नाउरू की आधिकारिक भाषा “नाउरूअन” (Nauruan) है, लेकिन अंग्रेजी भी व्यापक रूप से बोली जाती है।

    खान-पान – मछली, नारियल, और चावल यहां के मुख्य भोजन हैं।

    धर्म – ईसाई धर्म का नाउरू में प्रमुखता है। यहाँ के अधिकांश लोग प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक हैं।

    उत्सव और त्यौहार – स्वतंत्रता दिवस (31 जनवरी) और संविधान दिवस (17 मई) प्रमुख राष्ट्रीय पर्व हैं।

    राजनीति और शासन

    नाउरू एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहाँ संसद द्वारा राष्ट्रपति का चुनाव किया जाता है। यहाँ की सरकार एकसदनीय (unicameral) प्रणाली पर आधारित है और इसमें कुल 19 सांसद होते हैं। राष्ट्रपति देश का प्रमुख होता है और कैबिनेट का नेतृत्व करता है। नाउरू में कोई औपचारिक राजनीतिक दल नहीं हैं, इसलिए उम्मीदवार स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ते हैं।

    विदेश नीति की बात करें तो नाउरू के ऑस्ट्रेलिया और अन्य प्रशांत द्वीप राष्ट्रों के साथ घनिष्ठ संबंध हैं। इसके अलावा, केवल 19 सांसदों के साथ नाउरू की संसद दुनिया की सबसे छोटी संसद मानी जाती है।

    पर्यटन लगभग ना के बराबर

    नाउरू दुनिया के सबसे कम दौरा किए जाने वाले देशों में से एक है। हर साल यहां केवल 200-300 पर्यटक ही आते हैं। इसका मुख्य कारण सीमित सुविधाएं, कड़े वीज़ा नियम और कमजोर बुनियादी ढांचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) है, जिससे पर्यटन लगभग ना के बराबर है।यहाँ तक की यहासे सबसे नजदीकी देश भी हजारों किलोमीटर दूर है

    दुनिया का सबसे मोटा देश (TOP Fattest Country In The World)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    नाउरू को दुनिया का सबसे मोटा देश माना जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, नाउरू में 90% से अधिक वयस्कों का बीएमआई (BMI) सामान्य स्तर से अधिक है। और यहाँ के लोगों का औसत वजन लगभग 100 किलोग्राम है। नाउरू में रह रहे 97% पुरुष और 94% महिला मोटापे से ग्रस्त है। इसका मुख्य कारण पश्चिमी आहार संस्कृति का प्रभाव, शारीरिक गतिविधि की कमी और संसाधित खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन है।

    इसके अलावा नाउरू में टाइप 2 डायबिटीज़ के मामलों की संख्या विश्व में सबसे अधिक है। नाउरू 45% आबादी डायबिटीज से ग्रस्त है। हृदय रोग – उच्च मोटापा दर के कारण नाउरू में हृदय रोगों का खतरा भी बहुत बढ़ गया है।

    तंबाकू और स्वास्थ्य संकट

    नाउरूमें सिगरेट और तंबाकू की लत बहुत आम है। यहां लगभग 50% से अधिक लोग रोज़ाना धूम्रपान करते हैं, जो इसे दुनिया में सबसे ज्यादा धूम्रपान करने वाले देशों में से एक बनाता है।

    बंजर जमीन और समस्या

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    नाउरू की लगभग 80 प्रतिशत भूमि रहने योग्य नहीं है। इसका मुख्य कारण द्वीप पर बड़े पैमाने पर हुआ फॉस्फेट खनन है, जिसने इसकी जमीन को बंजर और अनुपयोगी बना दिया है। 20वीं शताब्दी में फॉस्फेट की अत्यधिक खुदाई के कारण द्वीप का अधिकांश भाग खराब हो गया, जिससे वहां खेती और आवास के लिए उपयुक्त भूमि बहुत कम बची है।

    खनन के कारण द्वीप के आंतरिक भाग में गहरे गड्ढे और ऊबड़-खाबड़ चट्टानी सतह बन गई है, जहां न तो कोई फसल उगाई जा सकती है और न ही आसानी से घर बनाए जा सकते हैं। इसके अलावा, जल स्रोतों की कमी और खराब पर्यावरणीय स्थिति ने इसे और भी कम रहने योग्य बना दिया है। अधिकतर लोग द्वीप के तटीय क्षेत्रों में बसते हैं, क्योंकि वहीं थोड़ी उपजाऊ जमीन और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

    तंबाकू और स्वास्थ्य संकट

    नाउरू में सिगरेट और तंबाकू की लत बहुत आम है। यहां लगभग 50% से अधिक लोग रोज़ाना धूम्रपान करते हैं, जो इसे दुनिया में सबसे ज्यादा धूम्रपान करने वाले देशों में से एक बनाता है। साल 2020 के आकड़ो के अनुसार नाउरू में धूम्रपान का दर विश्व में सबसे अधिक था।

    राजनीतिक अस्थिरता और विदेशी निर्भरता

    नाउरू की राजनीति अस्थिर रहती है। पिछले कुछ दशकों में यहां लगभग हर दो साल में सरकार बदल जाती है। इसके अलावा, आर्थिक संकट के कारण नाउरू को अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। ऑस्ट्रेलिया इसका सबसे बड़ा सहयोगी है और उसे वित्तीय सहायता देता है।

    वर्त्तमान समय में नाउरू

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

    नाउरू एक ऐसा देश है जो कई गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, जिनमें पर्यावरणीय क्षति, आर्थिक संकट, जल और खाद्य कमी, स्वास्थ्य समस्याएं, जलवायु परिवर्तन का खतरा, बेरोजगारी और पर्यटन का अभाव शामिल हैं। फॉस्फेट खनन के कारण इसकी 80% भूमि बंजर हो चुकी है, जिससे आवास और खेती के लिए उपयुक्त जगह बहुत कम बची है। खनिज भंडार खत्म होने के बाद नाउरू की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई, जिससे यह विदेशी सहायता पर निर्भर हो गया है। पानी और भोजन की आपूर्ति भी बड़ी चुनौती है, क्योंकि देश में न तो प्राकृतिक जल स्रोत हैं और न ही कृषि योग्य भूमि। स्वास्थ्य के मामले में, मोटापा और डायबिटीज जैसी बीमारियां बहुत आम हैं, जबकि शिक्षा और रोजगार के सीमित अवसर युवाओं को विदेश जाने के लिए मजबूर करते हैं।

    इसके अलावा, समुद्र तल बढ़ने से यह द्वीप जलवायु परिवर्तन के खतरे का भी सामना कर रहा है। पर्यटन भी बहुत कम है, क्योंकि बुनियादी सुविधाओं की कमी और कड़े वीजा नियम पर्यटकों को यहां आने से रोकते हैं। कुल मिलाकर, नाउरू को अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, पर्यावरणीय सुधार करने और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में प्रयास करने की जरूरत है, ताकि यह भविष्य में टिकाऊ विकास कर सके।

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